Monday, 28 October 2013

दख़ल की दुनिया: रात का शहर उनके लिए भय का शहर है

दख़ल की दुनिया: रात का शहर उनके लिए भय का शहर है: कीर्ति सुन्द्रियाल संवैधानिक आज़ादी सांस्कृतिक आयामों को बदल नहीं पा रही, बल्कि संस्कृति की पुरानी गुलामी समाज की नब्ज में बहती ही रहती...

Monday, 14 October 2013

शिवमूर्ति हमारे समय के बेहतरीन गद्यकार हैं। जीवन के यथार्थ की दृष्टि, सामाजिक संरचना की प्रस्तुति और रचना की सरल, स्वाभाविक प्रस्तुति उनकी खासियत है। अभी हाल में ही अपनी माँ को याद करते हुए एक छोटी सी कहानी लिखी, जिसको पढ़ते हुए आँखें छलछला गई। अब आपसे भी साझा कर रहा हूँ...
                     ---मॉडरेटर

मृत्यु का स्वागत


                चली गयी माँ।
                कितना ऊँचा नीचा समय देखा जिंदगी में लेकिन जीवन जीने का उत्साह कभी कम नहीं हुआ। ताजिंदगी नास्तिक रही। न उसने कोई व्रत उपवास किया न किसी मंदिर शिवालय में शीश झुकाने गयी। न तीरथ न स्नान। अपनी ही बनायी लीक पर चलते-चलते चली गयी।
                दादी का मानना था कि मेरा जन्म उनकी मनौती से हुआ था। उन्होंने गंगा जी से मनौती मानी थी - हे गंगा माईहमें पोता दीजिए। उसे आपकी लहरों को अर्पित करूंगी। आप की अमानत,आप की भिक्षा के रूप में रहेगी मेरे पास।
हमारे इलाके में जिन परिवारों में पुत्र नहीं होता था उन परिवारों की स्त्रियाँ गंगा माई से पुत्र की याचना करती थीं। पुत्र होने पर उसे गंगा को सौंपने जाती थी। मल्लाह नाव पर माँ बेटे को लेकर बीच धारा में जाता था। बच्चे को गंगा के पानी में रखता और तुरंत निकाल लेता था। फिर गंगा माई के प्रतिनिधि के रूप में कुछ पैसा लेकर उसे माँ के हाथों बेच देता था। अब यह खरीदा हुआ बच्चा अधिकारिक रूप से माँ का हो जाता था। कई बार ऐसे बच्चे का नाम बेचू’ रख दिया जाता था। बेचू सिंहबेचू पांडेबेचू यादव वगैरह। बेचू माने बिका हुआ। लेकिन एकाध बार ऐसा भी सुनने मे आया कि पानी में डालने के बाद मल्लाह बच्चे को पकड़ नही पाये। बच्चा लहरो में समा गया। तब रोती पीटती माँ को यह कह कर समझाया गया कि गंगा अपना बच्चा बेचने को तैयार नहीं हुईं। वापस ले गयीं। इसमें कोई क्या कर सकता है।
                ऐसे किस्से मेरी माँ ने भी सुन रखे होंगे। उसने तय किया कि वह बेटे को लेकर गंगा के पास जायेगी ही नहीं। कही गंगा माई ने उसके बेटे को भी लौटाने से इंकार कर दिया तो। दादी उन्हें गंगा की अमानत लौटाने के लिए कहती रहीं। गंगा के कोप का डर दिखाती रहीं लेकिन माँ टस से मस न हुईं। उनका तर्क था कि गंगा माई खुद तो पचीस कोस चलकर यहाँ अपनी अमानत लेने के लिए आने से रहीं। हम खुद बेटे को खतरे में डालने के लिए उनके पास क्यों जायें?
                कुछ वर्ष पहले चारपायी से गिरने के कारण उसे ब्रेन हैमरेज हो गया। आठ दिन बेहोश रही। स्वस्थ होने के बाद डिस्चार्ज करते हुए पी.जी.आई. के डाक्टर ने कहा-भगवान को धन्यवाद दीजिए कि उन्होंने चंगा कर दिया।
                मां ने कितनी सहजता से कहा था - धन्निबाद तो आपको है डाक्टर साहब। मरे से जिंदा कर दिए। भगवान तो मार ही डाले थे।
                डाक्टर हँसने लगे।
                मैं पांचवीं या छठी कक्षा में रहा होऊँगाजब पिताजी मुझे अपने गुरु बाबा रामदीन दास की कुटी पर ले गये और मेरा कान फुंकवा’ दिया। गुरु ने रूद्राक्ष की एक मोटी कंठी मेरे गले में पहना दी। साल डेढ़ साल मै उसे पहने रहा। साथी लडक़े चिढ़ाते-अबे भगतवा। जब पिताजी ज्यादातर अपने गुरु की कुटी पर रहने लगे तो मैने माँ से लडक़ों के चिढ़ाने की बात बतायी। माँ ने साफ कहा-तुझे अच्छी नहीं लगती तो निकाल कर फेंक। मुझे दुविधाग्रस्त देख माँ ने खुद मेरे गले से कंठी निकालकर बॉस की कोठ में फेंक दिया था।
                गर्मी की दोपहरी या जाड़े के अपरान्ह में सब काम से फुरसत पाकर माँ मुख्य दरवाजे के भीतरी भाग को गोबर से लीप कर गौर’ उठाने बैठती। जिन स्त्रियों के पति परदेश चले जाते थे वे दो-दो तीन-तीन वर्ष तक लौट कर नहीं आते थे। उन स्त्रियों के पास यह जानने का कोई उपाय नहीं रहता था कि इस फागुन या सावन में वे घर आ रहे हैं या नहीं?
चिट्ठियां साल भर में दो चार ही आती जाती थीं। ऐसे में इन विरहिरणियों का आविष्कार थी गौर माता। गौर माता तो सारी दुनिया का हाल जानती हैं। उन्हीं से पूछ लिया जाय।
गौर’ गाय के गीले गोबर से बना एक छोटा सा शंकु होता था। स्त्रियाँ उसे मौनी के पेट में सीधा खड़ा करके गौर सीधी खड़ी मिलती तो इसका मतलब था कि आयेंगे। गौर लुढक़ी मिली तो नहीं आयेंगे।
विरहिणी माँ भी गौर’ के माध्यम से प्रवासी पति की वापसी की संभावना तलाशा करती थी। माँ की आवाज में सुना गया यह आज भी मेरे कानों में बजता है -
पुसवा न आवैंमघवा न आवैंआवैं फगुनवा माँ रंग बरसैपरदेसिया न आवैं नयन तलफैं
पूस माघ में न आवैं न सही लेकिन फागुन मास में जब चारों तरफ रंग बरस रहा हो तो जरूर आ जायें। परदेशी को देखने के लिए नैन तलफ’ रहे हैं।
                हजारों गीत थे माँ के पास। गेहूँ पीसते हुएकथरी सिलते हुएलगवाही निरवाही करते हुए वह कुछ न कुछ गाती गुनगुनाती रहती थी। शाम को खाने पीने के बाद अँधेरी उजियारी रातों में दुआर पर चारपायी पर लेटे लेटे वह देर तक गाती रहती थी। सोचता था कि उस के साथ एकाध हफ्ते एकांत में बैठ कर सारे गीत लिख लूँगा पर टलता गया। सारे गीत माँ के साथ चले गये।
                पता चला कि माँ ज्यादा बीमार है तो गाँव पहुँचा। माँ नीम के पेड़ के नीचे चारपायी पर करवट लेटी थी। आँखें बंद थी। मैने पुकारा-माई!
                -ऐं। उसने आँखे खोलकर कर देखा-आ गये भइयाहम बहुत याद कर रहे थे।
                -कैसी हैं?
                -अब ठीक हैं। रात में तो मर गये थे। चार बजे पता नहीं कैसे कहाँ से फिर लौट आये।
                मैने माँ का हाथ पकडक़र उठाया। हाथ पकड़े पकड़े ही चार पाँच कदम टहलाया। कहा-सबेरे लखनऊ चलिए। वहाँ ठीक से दवा हो जायेगी। अच्छी हो जायेंगी।
                -ठीक है। भइयामेरा दांत भी बनवा देना। बहुत ढीला हो गया है।
                सवेरे हम वापसी के लिए तैयार हो रहे थे। कार की पिछली सीट पर उनके लेटने का इंतजाम किया गया। तभी जोखू चौधरी आ गये। माँ से उनकी तबियत का हाल पूछने लगे। यह जानकर कि वे लखनऊ जा रही हैंबोले-क्यों जा रही हैंदो चार दिन की तो मेहमान हैं। शरीर में सूजन आ गयी है। कान की लिलरी लटक गयी है। लखनऊ जाकर मरेंगी तो हम लोग आखिरी समय में आपका मुँह भी नहीं देख पायेंगे।
                और माँ ने आने का इरादा बदल दिया।
                -क्योंक्या हुआ?
                -अरे भइयाजब दो चार दिन में मर ही जाना है तो गाँव देश छोडऩे का क्या फायदा?आराम से अपने घर में मरेंगे।
                -ऐं। मरना भी आराम से?
                लाख समझाया कि अस्पताल में भर्ती करा देंगे। साल छ: महिने तो आराम से चल जायेगी।
                लेकिन वे अड़ गयीं तो अड़ गयी- हे भइया, ‘चलत पौरुख’ चले जाययही ठीक रहेगा।घिन्नी घिस कर’ मरने से क्या फायदा?
                पत्नी को उनकी सेवा में छोड़ कर मैं लौट आया। और चौथे दिन पत्नी का फोन आया -माँ चली गयीं।

                सचमुच आराम से चली गयी माँ। जैसे झोला लेकर सब्जी खरीदने बाजार चली गयी हों।

Wednesday, 9 October 2013

मैं नास्तिक क्यों हूँ?

                                       मैं नास्तिक क्यों हूँ?

 _ यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है । यह भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है। स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है। इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने यह लेख लिखा। (मॉडरेटर) 


                                 एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त – शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ – मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है। मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है। अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत है, और गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचार, उन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने मत पर गर्व है। लेकिन यह व्यक्तिगत नहीं है। ऐसा हो सकता है कि यह केवल अपने विश्वास के प्रति न्यायोचित गर्व हो और इसको घमण्ड नहीं कहा जा सकता। घमण्ड तो स्वयं के प्रति अनुचित गर्व की अधिकता है। क्या यह अनुचित गर्व है, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया? अथवा इस विषय का खूब सावधानी से अध्ययन करने और उस पर खूब विचार करने के बाद मैंने ईश्वर पर अविश्वास किया? मैं यह समझने में पूरी तरह से असफल रहा हूँ कि अनुचित गर्व या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है? किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं मान्यता न दूँ – यह तभी हो सकता है, जब मुझे भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं योग्य नहीं हूँ या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये आवश्यक हैं। यहाँ तक तो समझ में आता है। लेकिन यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं। या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन दोनो ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ। यह अहंकार नहीं है, जिसने मुझे नास्तिकता के सिद्धान्त को ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया। मैं न तो एक प्रतिद्वन्द्वी हूँ, न ही एक अवतार और न ही स्वयं परमात्मा। इस अभियोग को अस्वीकार करने के लिये आइए तथ्यों पर गौर करें। मेरे इन दोस्तों के अनुसार, दिल्ली बम केस और लाहौर षडयन्त्र केस के दौरान मुझे जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं वृथाभिमानी हो गया हूँ। मेरा नास्तिकतावाद कोई अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है। मैंने तो ईश्वर पर विश्वास करना तब छोड़ दिया था, जब मैं एक अप्रसिद्ध नौजवान था। कम से कम एक कालेज का विद्यार्थी तो ऐसे किसी अनुचित अहंकार को नहीं पाल-पोस सकता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाये। यद्यपि मैं कुछ अध्यापकों का चहेता था तथा कुछ अन्य को मैं अच्छा नहीं लगता था। पर मैं कभी भी बहुत मेहनती अथवा पढ़ाकू विद्यार्थी नहीं रहा। अहंकार जैसी भावना में फँसने का कोई मौका ही न मिल सका। मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था, जिसकी भविष्य के बारे में कुछ निराशावादी प्रकृति थी। मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। एक आर्य समाजी और कुछ भी हो, नास्तिक नहीं होता। अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने डी0 ए0 वी0 स्कूल, लाहौर में प्रवेश लिया और पूरे एक साल उसके छात्रावास में रहा। वहाँ सुबह और शाम की प्रार्थना के अतिरिक्त में घण्टों गायत्री मंत्र जपा करता था। उन दिनों मैं पूरा भक्त था। बाद में मैंने अपने पिता के साथ रहना शुरू किया। जहाँ तक धार्मिक रूढ़िवादिता का प्रश्न है, वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं। उन्हीं की शिक्षा से मुझे स्वतन्त्रता के ध्येय के लिये अपने जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा मिली। किन्तु वे नास्तिक नहीं हैं। उनका ईश्वर में दृढ़ विश्वास है। वे मुझे प्रतिदिन पूजा-प्रार्थना के लिये प्रोत्साहित करते रहते थे। इस प्रकार से मेरा पालन-पोषण हुआ। असहयोग आन्दोलन के दिनों में राष्ट्रीय कालेज में प्रवेश लिया। यहाँ आकर ही मैंने सारी धार्मिक समस्याओं – यहाँ तक कि ईश्वर के अस्तित्व के बारे में उदारतापूर्वक सोचना, विचारना तथा उसकी आलोचना करना शुरू किया। पर अभी भी मैं पक्का आस्तिक था। उस समय तक मैं अपने लम्बे बाल रखता था। यद्यपि मुझे कभी-भी सिक्ख या अन्य धर्मों की पौराणिकता और सिद्धान्तों में विश्वास न हो सका था। किन्तु मेरी ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ निष्ठा थी। बाद में मैं क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ा। वहाँ जिस पहले नेता से मेरा सम्पर्क हुआ वे तो पक्का विश्वास न होते हुए भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस ही नहीं कर सकते थे। ईश्वर के बारे में मेरे हठ पूर्वक पूछते रहने पर वे कहते, ‘'जब इच्छा हो, तब पूजा कर लिया करो।'’ यह नास्तिकता है, जिसमें साहस का अभाव है। दूसरे नेता, जिनके मैं सम्पर्क में आया, पक्के श्रद्धालु आदरणीय कामरेड शचीन्द्र नाथ सान्याल आजकल काकोरी षडयन्त्र केस के सिलसिले में आजीवन कारवास भोग रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ ईश्वर की महिमा का ज़ोर-शोर से गान है। उन्होंने उसमें ईश्वर के ऊपर प्रशंसा के पुष्प रहस्यात्मक वेदान्त के कारण बरसाये हैं। 28 जनवरी, 1925 को पूरे भारत में जो ‘दि रिवोल्यूशनरी’ (क्रान्तिकारी) पर्चा बाँटा गया था, वह उन्हीं के बौद्धिक श्रम का परिणाम है। उसमें सर्वशक्तिमान और उसकी लीला एवं कार्यों की प्रशंसा की गयी है। मेरा ईश्वर के प्रति अविश्वास का भाव क्रान्तिकारी दल में भी प्रस्फुटित नहीं हुआ था। काकोरी के सभी चार शहीदों ने अपने अन्तिम दिन भजन-प्रार्थना में गुजारे थे। राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ एक रूढ़िवादी आर्य समाजी थे। समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने वृहद अध्ययन के बावजूद राजेन लाहड़ी उपनिषद एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण की अपनी अभिलाषा को दबा न सके। मैंने उन सब मे सिर्फ एक ही व्यक्ति को देखा, जो कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहता था, ‘'दर्शन शास्त्र मनुष्य की दुर्बलता अथवा ज्ञान के सीमित होने के कारण उत्पन्न होता है। वह भी आजीवन निर्वासन की सजा भोग रहा है। परन्तु उसने भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं की। इस समय तक मैं केवल एक रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे। अब अपने कन्धों पर ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी – विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिये अध्ययन करो। अपने मत के पक्ष में तर्क देने के लिये सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। रोमांस की जगह गम्भीर विचारों ने ली ली। न और अधिक रहस्यवाद, न ही अन्धविश्वास। यथार्थवाद हमारा आधार बना। मुझे विश्वक्रान्ति के अनेक आदर्शों के बारे में पढ़ने का खूब मौका मिला। मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद के पिता माक्र्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लोगों को पढ़ा, जो अपने देश में सफलतापूर्वक क्रान्ति लाये थे। ये सभी नास्तिक थे। बाद में मुझे निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली। इसमें रहस्यवादी नास्तिकता थी। 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान परम आत्मा की बात, जिसने ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन और संचालन किया, एक कोरी बकवास है। मैंने अपने इस अविश्वास को प्रदर्शित किया। मैंने इस विषय पर अपने दोस्तों से बहस की। मैं एक घोषित नास्तिक हो चुका था। मई 1927 में मैं लाहौर में गिरफ़्तार हुआ। रेलवे पुलिस हवालात में मुझे एक महीना काटना पड़ा। पुलिस अफ़सरों ने मुझे बताया कि मैं लखनऊ में था, जब वहाँ काकोरी दल का मुकदमा चल रहा था, कि मैंने उन्हें छुड़ाने की किसी योजना पर बात की थी, कि उनकी सहमति पाने के बाद हमने कुछ बम प्राप्त किये थे, कि 1927 में दशहरा के अवसर पर उन बमों में से एक परीक्षण के लिये भीड़ पर फेंका गया, कि यदि मैं क्रान्तिकारी दल की गतिविधियों पर प्रकाश डालने वाला एक वक्तव्य दे दूँ, तो मुझे गिरफ़्तार नहीं किया जायेगा और इसके विपरीत मुझे अदालत में मुखबिर की तरह पेश किये बेगैर रिहा कर दिया जायेगा और इनाम दिया जायेगा। मैं इस प्रस्ताव पर हँसा। यह सब बेकार की बात थी। हम लोगों की भाँति विचार रखने वाले अपनी निर्दोष जनता पर बम नहीं फेंका करते। एक दिन सुबह सी0 आई0 डी0 के वरिष्ठ अधीक्षक श्री न्यूमन ने कहा कि यदि मैंने वैसा वक्तव्य नहीं दिया, तो मुझ पर काकोरी केस से सम्बन्धित विद्रोह छेड़ने के षडयन्त्र तथा दशहरा उपद्रव में क्रूर हत्याओं के लिये मुकदमा चलाने पर बाध्य होंगे और कि उनके पास मुझे सजा दिलाने व फाँसी पर लटकवाने के लिये उचित प्रमाण हैं। उसी दिन से कुछ पुलिस अफ़सरों ने मुझे नियम से दोनो समय ईश्वर की स्तुति करने के लिये फुसलाना शुरू किया। पर अब मैं एक नास्तिक था। मैं स्वयं के लिये यह बात तय करना चाहता था कि क्या शान्ति और आनन्द के दिनों में ही मैं नास्तिक होने का दम्भ भरता हूँ या ऐसे कठिन समय में भी मैं उन सिद्धान्तों पर अडिग रह सकता हूँ। बहुत सोचने के बाद मैंने निश्चय किया कि किसी भी तरह ईश्वर पर विश्वास तथा प्रार्थना मैं नहीं कर सकता। नहीं, मैंने एक क्षण के लिये भी नहीं की। यही असली परीक्षण था और मैं सफल रहा। अब मैं एक पक्का अविश्वासी था और तब से लगातार हूँ। इस परीक्षण पर खरा उतरना आसान काम न था। ‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल वैसी ही स्थिति है। निर्णय का पूरा-पूरा पता है। एक सप्ताह के अन्दर ही यह घोषित हो जायेगा कि मैं अपना जीवन एक ध्येय पर न्योछावर करने जा रहा हूँ। इस विचार के अतिरिक्त और क्या सान्त्वना हो सकती है? ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर सकता है। किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा – वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी। आगे कुछ न रहेगा। एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी – यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो। बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। जिस दिन हमें इस मनोवृत्ति के बहुत-से पुरुष और महिलाएँ मिल जायेंगे, जो अपने जीवन को मनुष्य की सेवा और पीड़ित मानवता के उद्धार के अतिरिक्त कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ होगा। वे शोषकों, उत्पीड़कों और अत्याचारियों को चुनौती देने के लिये उत्प्रेरित होंगे। इस लिये नहीं कि उन्हें राजा बनना है या कोई अन्य पुरस्कार प्राप्त करना है यहाँ या अगले जन्म में या मृत्योपरान्त स्वर्ग में। उन्हें तो मानवता की गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंकने और मुक्ति एवं शान्ति स्थापित करने के लिये इस मार्ग को अपनाना होगा। क्या वे उस रास्ते पर चलेंगे जो उनके अपने लिये ख़तरनाक किन्तु उनकी महान आत्मा के लिये एक मात्र कल्पनीय रास्ता है। क्या इस महान ध्येय के प्रति उनके गर्व को अहंकार कहकर उसका गलत अर्थ लगाया जायेगा? कौन इस प्रकार के घृणित विशेषण बोलने का साहस करेगा? या तो वह मूर्ख है या धूर्त। हमें चाहिए कि उसे क्षमा कर दें, क्योंकि वह उस हृदय में उद्वेलित उच्च विचारों, भावनाओं, आवेगों तथा उनकी गहराई को महसूस नहीं कर सकता। उसका हृदय मांस के एक टुकड़े की तरह मृत है। उसकी आँखों पर अन्य स्वार्थों के प्रेतों की छाया पड़ने से वे कमज़ोर हो गयी हैं। स्वयं पर भरोसा रखने के गुण को सदैव अहंकार की संज्ञा दी जा सकती है। यह दुखपूर्ण और कष्टप्रद है, पर चारा ही क्या है? आलोचना और स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य गुण हैं। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के प्रति विश्वास बना लिया था। अतः कोई भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, विश्वासघाती कहा जायेगा। यदि उसके तर्क इतने अकाट्य हैं कि उनका खण्डन वितर्क द्वारा नहीं हो सकता और उसकी आस्था इतनी प्रबल है कि उसे ईश्वर के प्रकोप से होने वाली विपत्तियों का भय दिखा कर दबाया नहीं जा सकता तो उसकी यह कह कर निन्दा की जायेगी कि वह वृथाभिमानी है। यह मेरा अहंकार नहीं था, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया। मेरे तर्क का तरीका संतोषप्रद सिद्ध होता है या नहीं इसका निर्णय मेरे पाठकों को करना है, मुझे नहीं। मैं जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास ने आज मेरा जीवन आसान और मेरा बोझ हलका कर दिया होता। उस पर मेरे अविश्वास ने सारे वातावरण को अत्यन्त शुष्क बना दिया है। थोड़ा-सा रहस्यवाद इसे कवित्वमय बना सकता है। किन्तु मेरे भाग्य को किसी उन्माद का सहारा नहीं चाहिए। मैं यथार्थवादी हूँ। मैं अन्तः प्रकृति पर विवेक की सहायता से विजय चाहता हूँ। इस ध्येय में मैं सदैव सफल नहीं हुआ हूँ। प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है। सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है। कोई भी मनुष्य, जिसमें तनिक भी विवेक शक्ति है, वह अपने वातावरण को तार्किक रूप से समझना चाहेगा। जहाँ सीधा प्रमाण नहीं है, वहाँ दर्शन शास्त्र का महत्व है। जब हमारे पूर्वजों ने फुरसत के समय विश्व के रहस्य को, इसके भूत, वर्तमान एवं भविष्य को, इसके क्यों और कहाँ से को समझने का प्रयास किया तो सीधे परिणामों के कठिन अभाव में हर व्यक्ति ने इन प्रश्नों को अपने ढ़ंग से हल किया। यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक मतों में हमको इतना अन्तर मिलता है, जो कभी-कभी वैमनस्य तथा झगड़े का रूप ले लेता है। न केवल पूर्व और पश्चिम के दर्शनों में मतभेद है, बल्कि प्रत्येक गोलार्ध के अपने विभिन्न मतों में आपस में अन्तर है। पूर्व के धर्मों में, इस्लाम तथा हिन्दू धर्म में ज़रा भी अनुरूपता नहीं है। भारत में ही बौद्ध तथा जैन धर्म उस ब्राह्मणवाद से बहुत अलग है, जिसमें स्वयं आर्यसमाज व सनातन धर्म जैसे विरोधी मत पाये जाते हैं। पुराने समय का एक स्वतन्त्र विचारक चार्वाक है। उसने ईश्वर को पुराने समय में ही चुनौती दी थी। हर व्यक्ति अपने को सही मानता है। दुर्भाग्य की बात है कि बजाय पुराने विचारकों के अनुभवों तथा विचारों को भविष्य में अज्ञानता के विरुद्ध लड़ाई का आधार बनाने के हम आलसियों की तरह, जो हम सिद्ध हो चुके हैं, उनके कथन में अविचल एवं संशयहीन विश्वास की चीख पुकार करते रहते हैं और इस प्रकार मानवता के विकास को जड़ बनाने के दोषी हैं। सिर्फ विश्वास और अन्ध विश्वास ख़तरनाक है। यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है। जो मनुष्य अपने को यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन रूढ़िगत विश्वासों को चुनौती देनी होगी। प्रचलित मतों को तर्क की कसौटी पर कसना होगा। यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके, तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेगा। तब नये दर्शन की स्थापना के लिये उनको पूरा धराशायी करकेे जगह साफ करना और पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग करके पुनर्निमाण करना। मैं प्राचीन विश्वासांे के ठोसपन पर प्रश्न करने के सम्बन्ध में आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन परम आत्मा का, जो प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करता है, कोई अस्तित्व नहीं है। हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगतिशील आन्दोलन का ध्येय मनुष्य द्वारा अपनी सेवा के लिये प्रकृति पर विजय प्राप्त करना मानते हैं। इसको दिशा देने के पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है। यही हमारा दर्शन है। हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं। यदि आपका विश्वास है कि एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बतायें कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और संतापों से पूर्ण दुनिया – असंख्य दुखों के शाश्वत अनन्त गठबन्धनों से ग्रसित! एक भी व्यक्ति तो पूरी तरह संतृष्ट नही है। कृपया यह न कहें कि यही उसका नियम है। यदि वह किसी नियम से बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है। वह भी हमारी ही तरह नियमों का दास है। कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका मनोरंजन है। नीरो ने बस एक रोम जलाया था। उसने बहुत थोड़ी संख्या में लोगांें की हत्या की थी। उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने पूर्ण मनोरंजन के लिये। और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाये जाते हैं। पन्ने उसकी निन्दा के वाक्यों से काले पुते हैं, भत्र्सना करते हैं – नीरो एक हृदयहीन, निर्दयी, दुष्ट। एक चंगेज खाँ ने अपने आनन्द के लिये कुछ हजार जानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं। तब किस प्रकार तुम अपने ईश्वर को न्यायोचित ठहराते हो? उस शाश्वत नीरो को, जो हर दिन, हर घण्टे ओर हर मिनट असंख्य दुख देता रहा, और अभी भी दे रहा है। फिर तुम कैसे उसके दुष्कर्मों का पक्ष लेने की सोचते हो, जो चंगेज खाँ से प्रत्येक क्षण अधिक है? क्या यह सब बाद में इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और गलती करने वालों को दण्ड देने के लिये हो रहा है? ठीक है, ठीक है। तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे, जो हमारे शरीर पर घाव करने का साहस इसलिये करता है कि बाद में मुलायम और आरामदायक मलहम लगायेगा? ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापक कहाँ तक उचित करते थे कि एक भूखे ख़ूंख़्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि, यदि वह उससे जान बचा लेता है, तो उसकी खूब देखभाल की जायेगी? इसलिये मैं पूछता हूँ कि उस चेतन परम आत्मा ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों की रचना क्यों की? आनन्द लूटने के लिये? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है? तुम मुसलमानो और ईसाइयो! तुम तो पूर्वजन्म में विश्वास नहीं करते। तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने शब्द द्वारा विश्व के उत्पत्ति के लिये छः दिन तक क्यों परिश्रम किया? और प्रत्येक दिन वह क्यों कहता है कि सब ठीक है? बुलाओ उसे आज। उसे पिछला इतिहास दिखाओ। उसे आज की परिस्थितियों का अध्ययन करने दो। हम देखेंगे कि क्या वह कहने का साहस करता है कि सब ठीक है। कारावास की काल-कोठरियों से लेकर झोपड़ियों की बस्तियों तक भूख से तड़पते लाखों इन्सानों से लेकर उन शोषित मज़दूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक निरुत्साह से देख रहे हैं तथा उस मानवशक्ति की बर्बादी देख रहे हैं, जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा, और अधिक उत्पादन को ज़रूरतमन्द लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देना बेहतर समझने से लेकर राजाआंे के उन महलों तक जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है- उसको यह सब देखने दो और फिर कहे – सब कुछ ठीक है! क्यों और कहाँ से? यही मेरा प्रश्न है। तुम चुप हो। ठीक है, तो मैं आगे चलता हूँ। और तुम हिन्दुओ, तुम कहते हो कि आज जो कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं और आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनन्द लूट रहे हैं। मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे। उन्होंने ऐसे सिद्धान्त गढ़े, जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफ़ी ताकत है। न्यायशास्त्र के अनुसार दण्ड को अपराधी पर पड़ने वाले असर के आधार पर केवल तीन कारणों से उचित ठहराया जा सकता है। वे हैं – प्रतिकार, भय तथा सुधार। आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धान्त की निन्दा की जाती है। भयभीत करने के सिद्धान्त का भी अन्त वहीं है। सुधार करने का सिद्धान्त ही केवल आवश्यक है और मानवता की प्रगति के लिये अनिवार्य है। इसका ध्येय अपराधी को योग्य और शान्तिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है। किन्तु यदि हम मनुष्यों को अपराधी मान भी लें, तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिये गये दण्ड की क्या प्रकृति है? तुम कहते हो वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है। तुम ऐसे 84 लाख दण्डों को गिनाते हो। मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर इनका सुधारक के रूप में क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो, जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गधा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण न दो। मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। और फिर क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है। गरीबी एक अभिशाप है। यह एक दण्ड है। मैं पूछता हूँ कि दण्ड प्रक्रिया की कहाँ तक प्रशंसा करें, जो अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे? क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था या उसको भी ये सारी बातें मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो, किसी गरीब या अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का क्या भाग्य होगा? चूँकि वह गरीब है, इसलिये पढ़ाई नहीं कर सकता। वह अपने साथियों से तिरस्कृत एवं परित्यक्त रहता है, जो ऊँची जाति में पैदा होने के कारण अपने को ऊँचा समझते हैं। उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं। यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोेगेगा? ईष्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दण्ड के बारे में क्या होगा, जिन्हें दम्भी ब्राह्मणों ने जानबूझ कर अज्ञानी बनाये रखा तथा जिनको तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों – वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा सहन करने की सजा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिये कौन ज़िम्मेदार होगा? और उनका प्रहार कौन सहेगा? मेरे प्रिय दोस्तों! ये सिद्धान्त विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं। ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं। अपटान सिंक्लेयर ने लिखा था कि मनुष्य को बस अमरत्व में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसकी सारी सम्पत्ति लूट लो। वह बगैर बड़बड़ाये इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा। धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबन्धन से ही जेल, फाँसी, कोड़े और ये सिद्धान्त उपजते हैं। मैं पूछता हूँ तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को क्यों नहीं उस समय रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? यह तो वह बहुत आसानी से कर सकता है। उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं की लड़ने की उग्रता को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे बचाया? उसने अंग्रेजों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने की भावना क्यों नहीं पैदा की? वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार त्याग दें और इस प्रकार केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव समाज को पूँजीवादी बेड़ियों से मुक्त करें? आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं। मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह लागू करे। जहाँ तक सामान्य भलाई की बात है, लोग समाजवाद के गुणों को मानते हैं। वे इसके व्यावहारिक न होने का बहाना लेकर इसका विरोध करते हैं। परमात्मा को आने दो और वह चीज को सही तरीके से कर दे। अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिये नहीं है कि ईश्वर चाहता है बल्कि इसलिये कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं। वे हमको अपने प्रभुत्व में ईश्वर की मदद से नहीं रखे हैं, बल्कि बन्दूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे। यह हमारी उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निन्दनीय अपराध – एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचार पूर्ण शोषण – सफलतापूर्वक कर रहे हैं। कहाँ है ईश्वर? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? एक नीरो, एक चंगेज, उसका नाश हो! क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति तथा मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बताता हूँ। चाल्र्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है। उसे पढ़ो। यह एक प्रकृति की घटना है। विभिन्न पदार्थों के, नीहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी। कब? इतिहास देखो। इसी प्रकार की घटना से जन्तु पैदा हुए और एक लम्बे दौर में मानव। डार्विन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो। और तदुपरान्त सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति के लगातार विरोध और उस पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा से हुआ। यह इस घटना की सम्भवतः सबसे सूक्ष्म व्याख्या है। तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अन्धा या लंगड़ा पैदा होता है? क्या यह उसके पूर्वजन्म में किये गये कार्यों का फल नहीं है? जीवविज्ञान वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाल लिया है। अवश्य ही तुम एक और बचकाना प्रश्न पूछ सकते हो। यदि ईश्वर नहीं है, तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर सूक्ष्म तथा स्पष्ट है। जिस प्रकार वे प्रेतों तथा दुष्ट आत्माओं में विश्वास करने लगे। अन्तर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और दर्शन अत्यन्त विकसित। इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को है, जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे तथा उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे। सभी धर्म, समप्रदाय, पन्थ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं। राजा के विरुद्ध हर विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है। मनुष्य की सीमाओं को पहचानने पर, उसकी दुर्बलता व दोष को समझने के बाद परीक्षा की घड़ियों में मनुष्य को बहादुरी से सामना करने के लिये उत्साहित करने, सभी ख़तरों को पुरुषत्व के साथ झेलने तथा सम्पन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिये ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना हुई। अपने व्यक्तिगत नियमों तथा अभिभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ा कर कल्पना एवं चित्रण किया गया। जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है, तो उसका उपयोग एक भय दिखाने वाले के रूप में किया जाता है। ताकि कोई मनुष्य समाज के लिये ख़तरा न बन जाये। जब उसके अभिभावक गुणों की व्याख्या होती ह,ै तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है। जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों द्वारा विश्वासघात तथा त्याग देने से अत्यन्त क्लेष में हो, तब उसे इस विचार से सान्त्वना मिल सकती हे कि एक सदा सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसको सहारा देगा तथा वह सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है। वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिये उपयोगी था। पीड़ा में पड़े मनुष्य के लिये ईश्वर की कल्पना उपयोगी होती है। समाज को इस विश्वास के विरुद्ध लड़ना होगा। मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करता है तथा यथार्थवादी बन जाता है, तब उसे श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पुरुषत्व के साथ सामना करना चाहिए, जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक सकती हैं। यही आज मेरी स्थिति है। यह मेरा अहंकार नहीं है, मेरे दोस्त! यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे नास्तिक बनाया है। ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ। मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा हे, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया। अतः मैं भी एक पुरुष की भाँति फाँसी के फन्दे की अन्तिम घड़ी तक सिर ऊँचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ। हमें देखना है कि मैं कैसे निभा पाता हूँ। मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा। जब मैंने उसे नास्तिक होने की बात बतायी तो उसने कहा, ‘'अपने अन्तिम दिनों में तुम विश्वास करने लगोगे।'’ मैंने कहा, ‘'नहीं, प्यारे दोस्त, ऐसा नहीं होगा। मैं इसे अपने लिये अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझाता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूँगा।'’ पाठकों और दोस्तों, क्या यह अहंकार है? अगर है तो मैं स्वीकार करता हूँ।

Thursday, 8 August 2013



डॉ गोपालदास नीरज भारत भारती सम्मान से सम्मानित होंगे । कल उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने घोषित किये वर्ष 2013-14 के लिए समस्त 112 पुरस्कार । अन्य सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकारों में प्रमुख हैं - सर्व आदरणीय मन्नू भंडारी, चित्रा मुदगल, सोम ठाकुर, चौथीराम यादव, बलदेव वंशी । सर्वश्री तेजेन्द्र शर्मा, अशोक चक्रधर, प्रकाश मनु, पुष्पपाल सिंह, नसीम साकेती, जीतेंद्रनाथ मिश्र, शैलेन्द्र सागर, बुद्धिनाथ मिश्र, वीरेन्द्र यादव, शिवओम अम्बर, चंद्रसेन विराट, रामशंकर त्रिपाठी, विनोद चन्द्र पाण्डेय 'विनोद' , रजनी पाथरे 'राजदान' , पारनन्दि निर्मला, वी वी विश्वम, आरिफ़ नज़ीर और सोमेश कुमार शुक्ला सहित अनेक अन्य विद्वान् । सभी को बधाई ।

Tuesday, 30 July 2013


भारतीय सत्ता को लेकर लिखी गई रघुवीर सहाय की यह कविता आज ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती है।  
                                                                     मॉडरेटर

 आपकी हँसी / रघुवीर सहाय 
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निर्धन जनता का शोषण है

कह कर आप हँसे

लोकतंत्र का अंतिम क्षण है

कह कर आप हँसे

सबके सब हैं भ्रष्टाचारी


कह कर आप हँसे


चारों ओर बड़ी लाचारी


कह कर आप हँसे


कितने आप सुरक्षित होंगे


मैं सोचने लगा


सहसा मुझे अकेला पा कर


फिर से आप हँसे






हाल में हुये मिड-डे मील घटना को एक सियासी चाल के रूप मे देखते एम॰ जे॰ अकबर। चुनाव के ठीक पहले बिछी बिसात और बिहार में हुए राजनीतिक परिवर्तन की स्थितियों को मुख्य कारक के रूप में देखते हुये।
                                                                                      मोडरेटर 


मिड-डे मील की सियासत

एम जे अकबर

मिड डे मील

यह इनसानी स्वभाव है कि व्यक्ति अगर अच्छे मूड में हो, तो वह अपने सहयोगी को इंतजार कर रही त्रासदी से बचाने में गर्व महसूस करता है. एक दागदार व्यक्ति को सतत रूप से जारी फिजूल तमाशे से बचाना एक अच्छा मौका हो सकता है.

संभवत: वक्त आ गया है, जब हम सब मिल कर 28 साल पहले दिल्ली में हुए सिख विरोधी दंगों के दौरान लोगों को हत्या और मारकाट के लिए उकसाने के मामले में सज्जन कुमार पर चल रही अदालती सुनवाई को खत्म करने के लिए एक याचिका दायर करें.

पिछले तीन दशक से वे बार-बार कानून में मौजूद छिद्रों का फायदा उठाकर बचते रहे हैं. इसमें अधिकारियों की मिलीभगत रही है. ऐसा पिछले हफ्ते एक बार फिर घटित हुआ. दिखावा क्यों करें? 1984 के दंगों के पीड़ितों को साफ संदेश दें कि उम्मीद छोड़ दें. यह भारतीय न्यायिक भूल-भुलैया में दाखिल होनेवाले हर व्यक्ति के लिए सही है.

अब राजनीतिक माहौल अगले आम चुनाव की ओर बढ़ रहा है. बातचीत और जनमत सर्वेक्षण एक दूसरे का मनोरंजन के दायरे में पीछा कर रहे हैं. कारणों को आगे रखने और प्रस्तावों से पीछे हटने, मतदाताओं पर असर डालने वाले मुद्दे और इसके कारणों की बारीक पड़ताल के बीच ऐसा लगता है कि चुनाव विश्लेंषकों का एक महत्वपूर्ण मुद्दे- न्याय न मिलने के कारण लोगों मंभ बढ़ते गुस्से पर ध्यान नहीं जाता है. न्याय का व्यापक फलक विडंबनाओं को जन्म दे सकता है.

बिहार में मिड-डे मील हादसे को लें. गरीबों का गुस्सा कानूनन जायज है. प्रिंसिपल और उसके साथी, जिन्होंने कीटनाशक के जरिये कुपोषित बच्चों को जहर दिया, वे सिर्फ लालच की वजह से बने अपराधी नहीं हैं, बल्कि उनके जेहन में शोषितों के प्रति घृणा की भावना है. लेकिन इस घटना का एक परिणाम अजीब है.

इस घटना के बाद बिहार के शिक्षक यह तर्क पेश करते हुए हड़ताल पर चले गये हैं कि मिड-डे मील मुहैया कराना उनका काम नहीं है. वे भी अन्याय से पीड़ित होने का दावा कर रहे हैं.

क्या इन दोनों शिकायतों के बीच संबंध है? हां, दोनों सरकार के धराशायी होने का संकेत हैं. सुप्रीम कोर्ट सरकारों को स्कूलों में खाना मुहैया कराने का आदेश देता है, लेकिन राज्य सरकारों के पास इसके लिए न तो बुनियादी ढांचा है न ही ऐसा करने की इच्छाशक्ति. उद्देश्य के साथ क्षमता का विकास करने का कोई प्रयास नहीं किया गया.

यह पैसे का सवाल नहीं है. इस खाने के लिए जरूरी पैसे पूरे देश के चरमरा चुके प्रशासन को चलाने के लिए जरूरी वित्तीय मदद का एक काफी छोटा हिस्सा है. पर कोई भी राज्य सरकार इस सच को स्वीकार करने का खतरा नहीं उठा सकती. ऐसा करना राजनीतिक आत्महत्या होगी. ऐसे में वे वही करते हैं, जो उन्होंने सीखा है. समझौते और चोरी पर टिकी व्यवस्था को बढ़ावा देना.

मिड-डे मील योजना के लिए पेशेवर तरीके की जरूरत है ताकि जबावदेही तय हो सके. इसके बदले सरकार शिक्षकों को पैसा दे देती है और उन्हें अपनी मनमर्जी से काम करने की इजाजत मिल जाती है. राजधानी से लेकर स्कूल तक, हर स्तर पर इसमें कमीशन तय है. पर हर कोई इतना बेईमान नहीं होता, नहीं तो छपरा जैसी घटनाएं अकसर होतीं.

लेकिन यह व्यवस्था गरीबों के साथ अमानवीय व्यवहार करती है. वह मानती है कि गरीब अपने घरों में गंदा खाना खाते हैं, फिर स्कूलों में उन्हें अच्छा खाना क्यों दिया जाये? इससे भी बडी त्रासदी जो सुर्खियां नहीं बन पाती, वह है हजारों बच्चों को सड़ा हुआ खाना देकर धीमा जहर दिया जाना. धीमी मौत खबर नहीं बनती है.

भारत में अन्याय नया नही है. आदिवासी सदियों से हाशिये पर हैं. सामंती भारत के पास उनके लिए समय नहीं है. आदिवासियों की न्याय की मांग बंदूक के जरिये सुनी जाती है. दूसरों ने अभी तक हिंसा का रास्त अख्तियार नहीं किया है. अभी भी गरीबों में लोकतंत्र के प्रति थोड़ा भरोसा है. वे अपना गुस्सा चुनावों में प्रदर्शित करते हैं. लेकिन सत्ताधारी वर्ग समय को अंतहीन संसाधन के तौर पर प्रयोग करता है.

भ्रष्टाचार भी अन्याय का पर्याय है, क्योंकि यह लोगों के संसाधनों की लूट पर टिका है. भ्रष्टाचार केवल अमीरों के बीच संपत्ति का आदान-प्रदान नहीं है, यह लोगों के पैसे का कुछ सीमित लोगों के हाथों में सिमट जाना है. बिहार में शिक्षक अपने वेतन से मिड-डे मील का खर्च नहीं दे रहे थे, वे करों से जमा हुए पैसों की बंदरबांट कर रहे थे. वैसी मोबाइल कंपनियां जिन्होंने कम कीमत पर स्पेक्ट्रम खरीदीं, वे भी राष्ट्रीय संपत्ति की चोरी कर रहे थे.

तानाशाही से न तो न्याय की उम्मीद की जाती है न ही यह दी जाती है. यही वजह है कि जब तानाशाह सत्ता से बेदखल होते हैं तो न्याय की मांग काफी तीव्र हो जाती है. लेकिन न्याय लोकतंत्र की मूल भावना है. साधारण अपराधों की सजा भी कानून के जरिये होती है. राजनीतिक अपराध का फैसला चुनावों में होता है.

जब न्याय नहीं दिया जाता है तो यह जेहन में हावी रहता है. आप इसे मंद कर सकते हैं, जैसा कि सज्जन कुमार के मामले में है, लेकिन राष्ट्रीय चेतना के किसी कोने से यह हमेशा आपका पीछा करती रहेगी. हर चुनाव न्याय पर फैसला होता है. यह फैसला भले ही सटीक न हो, लेकिन यह काम करता है.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के प्रधान संपादक हैं.

दख़ल की दुनिया: चमचमाती दिल्ली की असलियत

दख़ल की दुनिया: चमचमाती दिल्ली की असलियत: सुनील गांवों की लगातार उपेक्षा के कारण रोजगार के जो भी अवसर थे खत्म होते जा रहे हैं। खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। किसानों की जमी...

Sunday, 14 July 2013

                   
नासिरा शर्मा के उपन्यास और भारतीय मुसलमान

                             भारत में सन् सात सौ ग्यारह ईसवी (711 CE) में मुसलमानों का आगमन हुआ था। इसी साल वे स्पेन में भी दाखिल हुए थे। मुसलामानों का भारत में दाखिल होने का कारण था, समुद्री लूटेरों द्वारा मुसलमानों के नागरिक जहाज़ (पानी के जहाज़) को बंधक बनाना, जो कि सिंध के राजा दाहिर के राज्य में आता था। जब राजनैतिक और कुटनीतिक प्रयास विफ़ल हो गए तो हज्जाज बिन युसूफ ने जो कि बगदाद के थे, ने एक बेहद छोटी सेना के साथ मुहम्मद बिन क़ासिम को भेजा जो उस वक़्त मात्र सत्रह (17) वर्ष के थे मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध के राजा दाहिर को हरा कर जीत हासिल की, वहां जहां वर्तमान पाकिस्तान का हैदराबाद है। राजा दाहिर ने अपने पुत्रों और भारत के दूसरे राजाओं से मदद मांगी और मुहम्मद बिन क़ासिम से लडाई की। जिसके फ़लस्वरूप मुहम्मद बिन क़ासिम ने निरून, रावर, बहरोर, ब्रह्मनाबाद, अरोर, दीपालपुर और मुल्तान पर सात सौ तेरह (713 CE) में जीत हासिल की और सिंध और पंजाब के राज्यों से लेकर कश्मीर तक अपना राज्य स्थापित किया। मुहम्मद बिन क़ासिम की उम्र उस वक़्त मात्र उन्नीस (19) साल थी। तब से (713 CE) आगे सदियां गुजरते हुए 1857 तक (मुग़ल साम्राज्य के पतन तक ) भारत पर आधिपत्य था।  मुहम्मद बिन क़ासिम का भारत की जनता के साथ व्यवहार बेहद न्यायिक था, यही वजह थी कि जब वह बग़दाद वापस लौट रहा था तो यहां की जनता ने उसको नम आंखों से विदाई दी थी। भारत की जनता निराश थी क्योंकि उन्हें मुहम्मद बिन क़ासिम से बहुत प्यार मिला था।

           मालबार में ही एक कम्युनिटी ऐसी भी थी जो वहां चक्रवर्ती सम्राट फ़र्मस के हज़रत मुहम्मद (ईश्वर की उन पर शांति हो) के हाथों इस्लाम कुबुल करने के बाद से रह रही थी। सन् 713 CE से भारत में मुस्लिम साम्राज्य का आगाज़ हो चुका था जो की सन् 1857 तक जारी रहा, यह सफ़र कुछ ऐसे रहा कि कई और मुस्लिम शासक आये जो कि अपने ही मुस्लिम भाईयों से लड़े और अपना साम्राज्य फैलाया फिर चाहे वो मध्य एशिया के तुर्क हों, अफ़गान हों,  मंगोल की संताने हों या मुग़ल।

             ग्यारहवीं शताब्दी में मुस्लिम शासकों ने दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया जो कि बाद में मुग़ल शासकों की भी देश की राजधानी रही और सन् 1857 तक रही जब बहादुर शाह ज़फर को अंग्रेजों ने पदच्युत कर दिया। दिल्ली आज भी हमारे वर्तमान भारत देश की राजधानी है। दो सदी पहले भारत के सम्राट अकबर के द्वारा कुछ अंग्रेजों को यहां रुकने की इजाज़त दी गयी थी। इसके दो दशक बाद ही अंग्रेजों ने भारत के छोटे-छोटे राजाओं और नवाबों से सांठ-गांठ कर ली और मुग़ल शासकों के खिलाफ़ राजाओं और नवाबों की सेना की ताक़त बढ़ाने की नियत से उन पर खर्च करना शुरू कर दिया और मुग़ल शासक अंग्रेज़ों से दो सदी तक लड़ते रहे और आखिरी में सन् 1857 में अंग्रेज़ों ने मुग़ल साम्राज्य का अंत कर दिया।

                  भारत पर हज़ारों साल तक शासन करने के बावजूद भारत में मुस्लिम अल्प-संख्यक थे और आज भी अल्प-संख्यक ही हैं, बावजूद इसके भारत में ही दुनिया में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा मुसलमान रहते हैं। मुसलमानों के भारत पर इतने लम्बे समय तक राज करने का राज़ कुछ ऐसा ही था कि उनका अख़लाक़ और अंदाज़ यहां की जनता से बेहद मुहब्बत भरा था और यहां की जनता (बहु-संख्यक) ने भी उनको स्वीकारा और साथ-साथ रहे। वो लोग जो ये कहते हैं कि इस्लाम तलवार के बल पर फैला है के मुहं पर भारत के बहु-संख्यक लोग तमाचा समान है और वे यह गवाही दे रहे हैं कि अगर वाकई इस्लाम तलवार की ज़ोर पर फैला होता तो क्या वाक़ई भारत में हजारों साल तक एकछत्र राज करने पर भी इतने हिंदू बचे होते अर्थात नहीं। भारत में अस्सी प्रतिशत (80%) हिंदू की मौजूदगी इस बात की शहादत दे रही है कि मुस्लिम शासकों ने तलवार नहीं मुहब्बत सिखाई। मुसलमानों का यह फ़न आज भी उनको दूसरो से अलग करता है।

         भारत में मुस्लिम शासकों की पहचान यहां के इतिहास पढ़ने पर मालूम हो जाती है कि वे कितने पुर-खुलूस, मुहब्बती और प्रजा-प्रेमी थे और उन्होंने न्याय, सांस्कृतिक और सामजिक समरसता, बोलने की आज़ादी, धार्मिक आज़ादी, दूसरे धर्मों एवं लोगों के प्रति प्रेम-भाव, सभी धर्मों की भावनाओं के मद्देनज़र कानून-व्यवस्था की स्थापना, लोक-निर्माण कार्य, शैक्षणिक कार्य की स्थापना की।

          उस वक़्त जब यहां मुस्लिम शासकों का राज था भारत में मुसलमानों की आबादी बीस प्रतिशत (20%) थी, आज (15%) है। अगर पकिस्तान और बांग्लादेश अलग न होते तो हो सकता है कि भारत दुनिया का अकेला और पहला ऐसा देश होता जहां मुसलमानों की जनसंख्या सबसे ज्यादा होती। मगर अफ़सोस कि आज़ादी से पहले की छोटी सी भूल के कारण भारत देश के टुकड़े-टुकड़े हो गए। "लम्हों ने की खता और सदियां भुगत रही है..."

         जब अंग्रेजों ने यह फैसला कर लिया कि भारत को आज़ादी दे देनी चाहिए और भविष्य के शासकों (पूर्व के शासकों अर्थात मुसलामानों) को उनको सौप देना चाहिए। भारत के आज़ादी के ऐन मौक़े पर भारत का विभाजन करा दिया गया। जिसके फलस्वरूप पाकिस्तान बन गया।
                 मुसलमानों के पिछड़ेपन के कारणों की तलाश से पहले इस सच्चाई से रू-ब-रू होना अति आवश्यक है कि भारतीय मुसलमान न सिर्फ पिछड़ेपन की बोझ तले दबा हुआ है बल्कि 1947 में देश के बंटवारे ने मुसलमानों को अपने ही देश में मुजरिम बना दिया, क्योंकि बंटवारे की पूरी ज़िम्मेदारी मुसलमानों के सर पर बांधी गई। इसके साथ ही बंटवारे ने पुराने ज़ख्मों को उधेड़ा है और इसके फलस्वरूप मुसलमानों को बंटवारे के गुनाह की सज़ा के साथ-साथ आठवीं सदी में सिंध पर हमला करने वाले मुहम्मद क़ासिम और इनके साथ अफग़ान, तुर्क, मुग़ल एवं दूसरे मुसलमान बादशाहों ने अपनी हिंदू जनता के साथ जो अत्याचार किए थे उसकी भी क़ीमत चुकानी पड़ी और असका पदार्पण हिंदू-मुस्लिम दंगों के समय साफ़ झलकता है।
          नासिरा शर्मा का लेखन अक्सर विवादों में रहा है। चाहे वह ईरान की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उनका लेख हो या पाकिस्तान और अफगानिस्तान में स्त्रियों की अपमानित और नारकीय जिंदगी का बेखौफ वर्णन। उन्होंने अलग-अलग मुस्लिम देशों की सामाजिक स्थितियों का वर्णन करते वक्त उनकी आपस में तुलना भी की है कि कैसे इराक की महिलाएं पाकिस्तान व तुर्की की महिलाओं की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता से जीती हैं। नासिरा शर्मा ने महिला कथाकार होते हुए ईरान की क्रांति के दौरान वहां जाकर साहस और जिजीविषा के साथ कार्य किया और "सात नदियां एक समंदर" तथा "जहां फव्वारे लहू रोते हैं" जैसी कृतियां गढ़ीं। ‘सात नदियाँ एक समंदर’, ‘शाल्मली’, ‘ठीकरे की मंगनी’, ‘ज़िंदा मुहावरे’, ‘अक्षयवट’, ‘कुइयाँजान’, ‘जीरो रोड’  इनके चर्चित उपन्यास हैं।
          नासिरा शर्मा का साहित्य उपन्यास और कहानी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने हमारे समय के उन ज्वलंत मुद्दों पर चिंतन किया है जिससे हमारी सामाजिक संरचना, हमारी लोकतांत्रित सत्ता और हमारी संस्कृति प्रभावित रही है। ‘शाल्मली’ उपन्यास में नासिरा शर्मा शाल्मली की सास के बहाने उस मुद्दे से भिड़ती हैं जो कि अक्सर नारी संबंधी चर्चाओं में उठता है कि नारी ही नारी की दुश्मन होती है। नासिरा शर्मा के समग्र लेखन में से उभरता यह एक सकारात्मक नज़रिया उनके लेखन की विशेषता है। नासिरा शर्मा ने इराक़, अफ़ग़ानिस्तान तथा ईरान पर भी जो अध्ययन ग्रंथ लिखे हैं, वे उनके उस मिजाज़ और चिंताओं को प्रकट करते हैं जो हमारे समय के अंतरराष्ट्रीय बोध का एक अहम् अंश है। असल में नासिरा शर्मा हमारे समय के दर्दनाक़ मुद्दों की जड़ों और उनमें समाप्त होते मानव-अधिकारों का अपनी रचनाओं के द्वारा अत्यन्त मार्मिक चित्रण करती हैं। औरत के लिए औरत पुस्तक एक तरह से ‘शाल्मली’ तथा ‘ठीकरे की मंगनी’ के सह पाठ के रूप में पढ़ी जा सकती है, उसी तरह ‘ज़िन्दा मुहावरे’ और ‘अक्षयवट’ ये दोनों पुस्तके मुसलमान और राष्ट्र का सहपाठ बनती हैं। ‘पत्थर गली’ आदि कहानी संग्रह  मानव अधिकारों के प्रश्नों को सीधे-सीधे साहित्य में उठाने के लिए नासिरा शर्मा की भूमिका अग्रणीय मानी जा सकती है। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय दृष्टि-पटल पर इनकी रचनाओं में मानव अधिकारों का मुद्दा सिर चढ़ कर बोलता है। नासिरा शर्मा अपने साहित्य में इस तरह के मुद्दों को पूरी गंभीरता से उठाना उनके निजी लेखकीय दृष्टिकोण का चित्रण करता है। वे एक तरह से प्रतिबद्धता के साथ लिखती हैं। एक लेखक अपने आस-पास के समाज में फैली इन समस्याओं तथा मर्यादाओं के सिवा अपने लेखन के जरिए लेखक जो कुछ भी अपने समाज से ग्रहण करता है और यदि उसे कुछ लौटना है तो एक बेहतर स्वरूप में अपने समाज को ही।

मनुष्य की निजता, सोशल साइट्स और अमेरिका
                                    यदुवंश यादव  
                    
                      यह बहुत ही सामान्य बात है कि किसी की भी निजता में दखल देना नितांत ही गलत है। वह भी तब, जब इस निजता से किसी व्यक्ति, समुदाय, संस्था, राष्ट्र पर कोई गलत प्रभाव न पड़ रहा हो। अभी बीते दिनों की ही बात है कि अमेरिकी सरकार द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन प्रिज्म के बारे में पता चला। इस ऑपरेशन के तहत अमेरिकी सरकार सोशल साइट्स व इंटरनेट नेटवर्किंग के माध्यम से पूरे विश्व के लोगों की वैचारिक व व्यवहारिक निजता को खंगाल कर आंकड़े एकत्रित करने में लगी है। आज पूरे विश्व में सोशल साइटों का क्रेज़ बहुत बढ़ गया है। लोग अपनी अधिकांश वैचारिक या व्यवहारिक प्रवृत्तियों को गाहे-बगाहे इन पर प्रदर्शित कर रहें हैं। किसी भी सरकार या सत्ता का समर्थन हो या विरोध, किसी भी उत्पाद की पसंद से नापसंद तक, आस्था-अनास्था, शिक्षा, रोजगार, पूंजी आदि सभी प्रश्न इन सोशल साइट्स पर लोगों के द्वारा व्यक्त किए जाते हैं। ये सारी वैचारिकी उनकी अपनी निजी वैचारिकी होती है। इन वैचारिकी से समाज व सत्ताएं भी प्रभावित होती रहती हैं। अमेरिका विश्व सत्ता व विश्व शक्ति की लोलुपता के कारण ही इन आंकड़ों को इकट्ठा करने में लगा है। आप क्या सोच रहे हैं या आप क्या कर रहे हैं इन सब चीजों का आंकड़ा वह इस ऑपरेशन के तहत एकत्रित कर रहा है। अधिकांश सत्ताएं अमेरिकी सत्ता की पिछलग्गू बनी हुई हैं, इसी बात का फायदा उठाकर अमेरिकी सत्ता पूरे विश्व को प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष रूप से ही अपने अधीन करने पर तुली है। कौन सा देश या समाज उसकी प्रवृत्तियों के विरोध में है वह इसका आकलन भी इसी के द्वारा करेगा। लोगों में किस तरह के उत्पाद की आवश्यकता है, शिक्षा किस तरह की होनी चाहिए आदि इसी तरह के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपना आधिपत्य जमाकर उसे अपनी साम्राज्यवादी सोच के अनुसार चलाने के प्रयास में है। यदि कोई भी देश तकनीकी रूप से समृद्ध है तो यह कत्तई नहीं होना चाहिए कि वह अन्य लोगों की निजता में दखलंदाजी करे। आज तकनीकी इतनी समृद्ध है कि वह इसी देश के किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत परिचय से लेकर उसके बैंकिंग व ई-मेल तथा अन्य नेटवर्किंग के बारे में आसानी से पता लगा सकती है। निजता प्राकृतिक रूप से व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इसमें सामान्य दखल भी गलत होता है, और इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि अमेरिका जैसा देश या फिर विश्व का कोई भी देश इसका सार्थक उपयोग ही करेगा।

          आज जो फेसबुक अधिकांश व्यक्तियों के जीवन का अभिन्न अंग बना है और निजता के स्तर पर भी वह एक प्रभावी तंत्र है जिस कारण से ही अमेरिकी सत्ता ने इसके मुखिया जुकरबर्ग से इसी परिप्रेक्ष्य में एक अनुबंध भी किया है। इस अनुबंध के तहत फेसबुक संस्था उन सभी लोगों की व्यक्तिगत जानकारी व इस पर किए गए प्रत्येक कार्य-व्यापार की जानकारी अमेरिका को देगा जो लोग इस सोशल नेटवर्किंग साइट से जुड़े हैं। निजता पर दखल का यह एक बड़ा उदाहरण है और इसका विरोध भी होना चाहिए। व्यक्ति की निजता ही उसको समाज के सामने एक विशेष रूप में प्रस्तुत करती है। व्यक्ति की निजता भी समाज के बनने में कहीं न कहीं उत्तरदाई है, इसलिए सुरक्षा के नाम पर झूठे तर्क  देना बेमानी सी बात लगती है। 

Friday, 12 July 2013

दख़ल की दुनिया: गंटी प्रसादम जिंदा रहेंगे

दख़ल की दुनिया: गंटी प्रसादम जिंदा रहेंगे: रेयाज उल हक वे जिंदा रहेंगे. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कल दोपहर में उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि हत्य...

Saturday, 8 June 2013

तुम्हारी प्रासंगिकता
आज मैं डरता हूं
बिल्ली से, चूहे से
अंधेरे से और सूनसान रास्ते से भी
बचपन से तुमने ही बताया है कि 
इनसे डरना चाहिए,
डरता हूं मैं
तुम्हारी बड़ी लाल आंखों से
गुर्राई आवाज से
और तुम्हारे चाटों से
बचपन से इन्ही के भरोसे
काबू में रखा है तुमने
मैं डरता हूं
अंग्रेज़ी से
गणित से
विज्ञान से
संस्कृत से...
बचपन से यही पढ़ाया है तुमने
मैं डरता हूं
तुम्हारी संस्कृति
परंपरा व रूढ़ियों से
जो मुझे जकड़े रहती हैं
तुम्हारे अनावश्यक बंधनों से
मैं तुम्हारे इस
डर, काबू, ज्ञान और बंधन से
मुक्त होना चाहता हूं
क्योंकि तुम अपनी
प्रासंगिकता खो चुके हो।