Saturday, 8 June 2013

तुम्हारी प्रासंगिकता
आज मैं डरता हूं
बिल्ली से, चूहे से
अंधेरे से और सूनसान रास्ते से भी
बचपन से तुमने ही बताया है कि 
इनसे डरना चाहिए,
डरता हूं मैं
तुम्हारी बड़ी लाल आंखों से
गुर्राई आवाज से
और तुम्हारे चाटों से
बचपन से इन्ही के भरोसे
काबू में रखा है तुमने
मैं डरता हूं
अंग्रेज़ी से
गणित से
विज्ञान से
संस्कृत से...
बचपन से यही पढ़ाया है तुमने
मैं डरता हूं
तुम्हारी संस्कृति
परंपरा व रूढ़ियों से
जो मुझे जकड़े रहती हैं
तुम्हारे अनावश्यक बंधनों से
मैं तुम्हारे इस
डर, काबू, ज्ञान और बंधन से
मुक्त होना चाहता हूं
क्योंकि तुम अपनी
प्रासंगिकता खो चुके हो।

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