Monday, 14 October 2013

शिवमूर्ति हमारे समय के बेहतरीन गद्यकार हैं। जीवन के यथार्थ की दृष्टि, सामाजिक संरचना की प्रस्तुति और रचना की सरल, स्वाभाविक प्रस्तुति उनकी खासियत है। अभी हाल में ही अपनी माँ को याद करते हुए एक छोटी सी कहानी लिखी, जिसको पढ़ते हुए आँखें छलछला गई। अब आपसे भी साझा कर रहा हूँ...
                     ---मॉडरेटर

मृत्यु का स्वागत


                चली गयी माँ।
                कितना ऊँचा नीचा समय देखा जिंदगी में लेकिन जीवन जीने का उत्साह कभी कम नहीं हुआ। ताजिंदगी नास्तिक रही। न उसने कोई व्रत उपवास किया न किसी मंदिर शिवालय में शीश झुकाने गयी। न तीरथ न स्नान। अपनी ही बनायी लीक पर चलते-चलते चली गयी।
                दादी का मानना था कि मेरा जन्म उनकी मनौती से हुआ था। उन्होंने गंगा जी से मनौती मानी थी - हे गंगा माईहमें पोता दीजिए। उसे आपकी लहरों को अर्पित करूंगी। आप की अमानत,आप की भिक्षा के रूप में रहेगी मेरे पास।
हमारे इलाके में जिन परिवारों में पुत्र नहीं होता था उन परिवारों की स्त्रियाँ गंगा माई से पुत्र की याचना करती थीं। पुत्र होने पर उसे गंगा को सौंपने जाती थी। मल्लाह नाव पर माँ बेटे को लेकर बीच धारा में जाता था। बच्चे को गंगा के पानी में रखता और तुरंत निकाल लेता था। फिर गंगा माई के प्रतिनिधि के रूप में कुछ पैसा लेकर उसे माँ के हाथों बेच देता था। अब यह खरीदा हुआ बच्चा अधिकारिक रूप से माँ का हो जाता था। कई बार ऐसे बच्चे का नाम बेचू’ रख दिया जाता था। बेचू सिंहबेचू पांडेबेचू यादव वगैरह। बेचू माने बिका हुआ। लेकिन एकाध बार ऐसा भी सुनने मे आया कि पानी में डालने के बाद मल्लाह बच्चे को पकड़ नही पाये। बच्चा लहरो में समा गया। तब रोती पीटती माँ को यह कह कर समझाया गया कि गंगा अपना बच्चा बेचने को तैयार नहीं हुईं। वापस ले गयीं। इसमें कोई क्या कर सकता है।
                ऐसे किस्से मेरी माँ ने भी सुन रखे होंगे। उसने तय किया कि वह बेटे को लेकर गंगा के पास जायेगी ही नहीं। कही गंगा माई ने उसके बेटे को भी लौटाने से इंकार कर दिया तो। दादी उन्हें गंगा की अमानत लौटाने के लिए कहती रहीं। गंगा के कोप का डर दिखाती रहीं लेकिन माँ टस से मस न हुईं। उनका तर्क था कि गंगा माई खुद तो पचीस कोस चलकर यहाँ अपनी अमानत लेने के लिए आने से रहीं। हम खुद बेटे को खतरे में डालने के लिए उनके पास क्यों जायें?
                कुछ वर्ष पहले चारपायी से गिरने के कारण उसे ब्रेन हैमरेज हो गया। आठ दिन बेहोश रही। स्वस्थ होने के बाद डिस्चार्ज करते हुए पी.जी.आई. के डाक्टर ने कहा-भगवान को धन्यवाद दीजिए कि उन्होंने चंगा कर दिया।
                मां ने कितनी सहजता से कहा था - धन्निबाद तो आपको है डाक्टर साहब। मरे से जिंदा कर दिए। भगवान तो मार ही डाले थे।
                डाक्टर हँसने लगे।
                मैं पांचवीं या छठी कक्षा में रहा होऊँगाजब पिताजी मुझे अपने गुरु बाबा रामदीन दास की कुटी पर ले गये और मेरा कान फुंकवा’ दिया। गुरु ने रूद्राक्ष की एक मोटी कंठी मेरे गले में पहना दी। साल डेढ़ साल मै उसे पहने रहा। साथी लडक़े चिढ़ाते-अबे भगतवा। जब पिताजी ज्यादातर अपने गुरु की कुटी पर रहने लगे तो मैने माँ से लडक़ों के चिढ़ाने की बात बतायी। माँ ने साफ कहा-तुझे अच्छी नहीं लगती तो निकाल कर फेंक। मुझे दुविधाग्रस्त देख माँ ने खुद मेरे गले से कंठी निकालकर बॉस की कोठ में फेंक दिया था।
                गर्मी की दोपहरी या जाड़े के अपरान्ह में सब काम से फुरसत पाकर माँ मुख्य दरवाजे के भीतरी भाग को गोबर से लीप कर गौर’ उठाने बैठती। जिन स्त्रियों के पति परदेश चले जाते थे वे दो-दो तीन-तीन वर्ष तक लौट कर नहीं आते थे। उन स्त्रियों के पास यह जानने का कोई उपाय नहीं रहता था कि इस फागुन या सावन में वे घर आ रहे हैं या नहीं?
चिट्ठियां साल भर में दो चार ही आती जाती थीं। ऐसे में इन विरहिरणियों का आविष्कार थी गौर माता। गौर माता तो सारी दुनिया का हाल जानती हैं। उन्हीं से पूछ लिया जाय।
गौर’ गाय के गीले गोबर से बना एक छोटा सा शंकु होता था। स्त्रियाँ उसे मौनी के पेट में सीधा खड़ा करके गौर सीधी खड़ी मिलती तो इसका मतलब था कि आयेंगे। गौर लुढक़ी मिली तो नहीं आयेंगे।
विरहिणी माँ भी गौर’ के माध्यम से प्रवासी पति की वापसी की संभावना तलाशा करती थी। माँ की आवाज में सुना गया यह आज भी मेरे कानों में बजता है -
पुसवा न आवैंमघवा न आवैंआवैं फगुनवा माँ रंग बरसैपरदेसिया न आवैं नयन तलफैं
पूस माघ में न आवैं न सही लेकिन फागुन मास में जब चारों तरफ रंग बरस रहा हो तो जरूर आ जायें। परदेशी को देखने के लिए नैन तलफ’ रहे हैं।
                हजारों गीत थे माँ के पास। गेहूँ पीसते हुएकथरी सिलते हुएलगवाही निरवाही करते हुए वह कुछ न कुछ गाती गुनगुनाती रहती थी। शाम को खाने पीने के बाद अँधेरी उजियारी रातों में दुआर पर चारपायी पर लेटे लेटे वह देर तक गाती रहती थी। सोचता था कि उस के साथ एकाध हफ्ते एकांत में बैठ कर सारे गीत लिख लूँगा पर टलता गया। सारे गीत माँ के साथ चले गये।
                पता चला कि माँ ज्यादा बीमार है तो गाँव पहुँचा। माँ नीम के पेड़ के नीचे चारपायी पर करवट लेटी थी। आँखें बंद थी। मैने पुकारा-माई!
                -ऐं। उसने आँखे खोलकर कर देखा-आ गये भइयाहम बहुत याद कर रहे थे।
                -कैसी हैं?
                -अब ठीक हैं। रात में तो मर गये थे। चार बजे पता नहीं कैसे कहाँ से फिर लौट आये।
                मैने माँ का हाथ पकडक़र उठाया। हाथ पकड़े पकड़े ही चार पाँच कदम टहलाया। कहा-सबेरे लखनऊ चलिए। वहाँ ठीक से दवा हो जायेगी। अच्छी हो जायेंगी।
                -ठीक है। भइयामेरा दांत भी बनवा देना। बहुत ढीला हो गया है।
                सवेरे हम वापसी के लिए तैयार हो रहे थे। कार की पिछली सीट पर उनके लेटने का इंतजाम किया गया। तभी जोखू चौधरी आ गये। माँ से उनकी तबियत का हाल पूछने लगे। यह जानकर कि वे लखनऊ जा रही हैंबोले-क्यों जा रही हैंदो चार दिन की तो मेहमान हैं। शरीर में सूजन आ गयी है। कान की लिलरी लटक गयी है। लखनऊ जाकर मरेंगी तो हम लोग आखिरी समय में आपका मुँह भी नहीं देख पायेंगे।
                और माँ ने आने का इरादा बदल दिया।
                -क्योंक्या हुआ?
                -अरे भइयाजब दो चार दिन में मर ही जाना है तो गाँव देश छोडऩे का क्या फायदा?आराम से अपने घर में मरेंगे।
                -ऐं। मरना भी आराम से?
                लाख समझाया कि अस्पताल में भर्ती करा देंगे। साल छ: महिने तो आराम से चल जायेगी।
                लेकिन वे अड़ गयीं तो अड़ गयी- हे भइया, ‘चलत पौरुख’ चले जाययही ठीक रहेगा।घिन्नी घिस कर’ मरने से क्या फायदा?
                पत्नी को उनकी सेवा में छोड़ कर मैं लौट आया। और चौथे दिन पत्नी का फोन आया -माँ चली गयीं।

                सचमुच आराम से चली गयी माँ। जैसे झोला लेकर सब्जी खरीदने बाजार चली गयी हों।

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