Tuesday, 30 July 2013


भारतीय सत्ता को लेकर लिखी गई रघुवीर सहाय की यह कविता आज ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती है।  
                                                                     मॉडरेटर

 आपकी हँसी / रघुवीर सहाय 
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निर्धन जनता का शोषण है

कह कर आप हँसे

लोकतंत्र का अंतिम क्षण है

कह कर आप हँसे

सबके सब हैं भ्रष्टाचारी


कह कर आप हँसे


चारों ओर बड़ी लाचारी


कह कर आप हँसे


कितने आप सुरक्षित होंगे


मैं सोचने लगा


सहसा मुझे अकेला पा कर


फिर से आप हँसे






हाल में हुये मिड-डे मील घटना को एक सियासी चाल के रूप मे देखते एम॰ जे॰ अकबर। चुनाव के ठीक पहले बिछी बिसात और बिहार में हुए राजनीतिक परिवर्तन की स्थितियों को मुख्य कारक के रूप में देखते हुये।
                                                                                      मोडरेटर 


मिड-डे मील की सियासत

एम जे अकबर

मिड डे मील

यह इनसानी स्वभाव है कि व्यक्ति अगर अच्छे मूड में हो, तो वह अपने सहयोगी को इंतजार कर रही त्रासदी से बचाने में गर्व महसूस करता है. एक दागदार व्यक्ति को सतत रूप से जारी फिजूल तमाशे से बचाना एक अच्छा मौका हो सकता है.

संभवत: वक्त आ गया है, जब हम सब मिल कर 28 साल पहले दिल्ली में हुए सिख विरोधी दंगों के दौरान लोगों को हत्या और मारकाट के लिए उकसाने के मामले में सज्जन कुमार पर चल रही अदालती सुनवाई को खत्म करने के लिए एक याचिका दायर करें.

पिछले तीन दशक से वे बार-बार कानून में मौजूद छिद्रों का फायदा उठाकर बचते रहे हैं. इसमें अधिकारियों की मिलीभगत रही है. ऐसा पिछले हफ्ते एक बार फिर घटित हुआ. दिखावा क्यों करें? 1984 के दंगों के पीड़ितों को साफ संदेश दें कि उम्मीद छोड़ दें. यह भारतीय न्यायिक भूल-भुलैया में दाखिल होनेवाले हर व्यक्ति के लिए सही है.

अब राजनीतिक माहौल अगले आम चुनाव की ओर बढ़ रहा है. बातचीत और जनमत सर्वेक्षण एक दूसरे का मनोरंजन के दायरे में पीछा कर रहे हैं. कारणों को आगे रखने और प्रस्तावों से पीछे हटने, मतदाताओं पर असर डालने वाले मुद्दे और इसके कारणों की बारीक पड़ताल के बीच ऐसा लगता है कि चुनाव विश्लेंषकों का एक महत्वपूर्ण मुद्दे- न्याय न मिलने के कारण लोगों मंभ बढ़ते गुस्से पर ध्यान नहीं जाता है. न्याय का व्यापक फलक विडंबनाओं को जन्म दे सकता है.

बिहार में मिड-डे मील हादसे को लें. गरीबों का गुस्सा कानूनन जायज है. प्रिंसिपल और उसके साथी, जिन्होंने कीटनाशक के जरिये कुपोषित बच्चों को जहर दिया, वे सिर्फ लालच की वजह से बने अपराधी नहीं हैं, बल्कि उनके जेहन में शोषितों के प्रति घृणा की भावना है. लेकिन इस घटना का एक परिणाम अजीब है.

इस घटना के बाद बिहार के शिक्षक यह तर्क पेश करते हुए हड़ताल पर चले गये हैं कि मिड-डे मील मुहैया कराना उनका काम नहीं है. वे भी अन्याय से पीड़ित होने का दावा कर रहे हैं.

क्या इन दोनों शिकायतों के बीच संबंध है? हां, दोनों सरकार के धराशायी होने का संकेत हैं. सुप्रीम कोर्ट सरकारों को स्कूलों में खाना मुहैया कराने का आदेश देता है, लेकिन राज्य सरकारों के पास इसके लिए न तो बुनियादी ढांचा है न ही ऐसा करने की इच्छाशक्ति. उद्देश्य के साथ क्षमता का विकास करने का कोई प्रयास नहीं किया गया.

यह पैसे का सवाल नहीं है. इस खाने के लिए जरूरी पैसे पूरे देश के चरमरा चुके प्रशासन को चलाने के लिए जरूरी वित्तीय मदद का एक काफी छोटा हिस्सा है. पर कोई भी राज्य सरकार इस सच को स्वीकार करने का खतरा नहीं उठा सकती. ऐसा करना राजनीतिक आत्महत्या होगी. ऐसे में वे वही करते हैं, जो उन्होंने सीखा है. समझौते और चोरी पर टिकी व्यवस्था को बढ़ावा देना.

मिड-डे मील योजना के लिए पेशेवर तरीके की जरूरत है ताकि जबावदेही तय हो सके. इसके बदले सरकार शिक्षकों को पैसा दे देती है और उन्हें अपनी मनमर्जी से काम करने की इजाजत मिल जाती है. राजधानी से लेकर स्कूल तक, हर स्तर पर इसमें कमीशन तय है. पर हर कोई इतना बेईमान नहीं होता, नहीं तो छपरा जैसी घटनाएं अकसर होतीं.

लेकिन यह व्यवस्था गरीबों के साथ अमानवीय व्यवहार करती है. वह मानती है कि गरीब अपने घरों में गंदा खाना खाते हैं, फिर स्कूलों में उन्हें अच्छा खाना क्यों दिया जाये? इससे भी बडी त्रासदी जो सुर्खियां नहीं बन पाती, वह है हजारों बच्चों को सड़ा हुआ खाना देकर धीमा जहर दिया जाना. धीमी मौत खबर नहीं बनती है.

भारत में अन्याय नया नही है. आदिवासी सदियों से हाशिये पर हैं. सामंती भारत के पास उनके लिए समय नहीं है. आदिवासियों की न्याय की मांग बंदूक के जरिये सुनी जाती है. दूसरों ने अभी तक हिंसा का रास्त अख्तियार नहीं किया है. अभी भी गरीबों में लोकतंत्र के प्रति थोड़ा भरोसा है. वे अपना गुस्सा चुनावों में प्रदर्शित करते हैं. लेकिन सत्ताधारी वर्ग समय को अंतहीन संसाधन के तौर पर प्रयोग करता है.

भ्रष्टाचार भी अन्याय का पर्याय है, क्योंकि यह लोगों के संसाधनों की लूट पर टिका है. भ्रष्टाचार केवल अमीरों के बीच संपत्ति का आदान-प्रदान नहीं है, यह लोगों के पैसे का कुछ सीमित लोगों के हाथों में सिमट जाना है. बिहार में शिक्षक अपने वेतन से मिड-डे मील का खर्च नहीं दे रहे थे, वे करों से जमा हुए पैसों की बंदरबांट कर रहे थे. वैसी मोबाइल कंपनियां जिन्होंने कम कीमत पर स्पेक्ट्रम खरीदीं, वे भी राष्ट्रीय संपत्ति की चोरी कर रहे थे.

तानाशाही से न तो न्याय की उम्मीद की जाती है न ही यह दी जाती है. यही वजह है कि जब तानाशाह सत्ता से बेदखल होते हैं तो न्याय की मांग काफी तीव्र हो जाती है. लेकिन न्याय लोकतंत्र की मूल भावना है. साधारण अपराधों की सजा भी कानून के जरिये होती है. राजनीतिक अपराध का फैसला चुनावों में होता है.

जब न्याय नहीं दिया जाता है तो यह जेहन में हावी रहता है. आप इसे मंद कर सकते हैं, जैसा कि सज्जन कुमार के मामले में है, लेकिन राष्ट्रीय चेतना के किसी कोने से यह हमेशा आपका पीछा करती रहेगी. हर चुनाव न्याय पर फैसला होता है. यह फैसला भले ही सटीक न हो, लेकिन यह काम करता है.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के प्रधान संपादक हैं.

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दख़ल की दुनिया: चमचमाती दिल्ली की असलियत: सुनील गांवों की लगातार उपेक्षा के कारण रोजगार के जो भी अवसर थे खत्म होते जा रहे हैं। खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। किसानों की जमी...

Sunday, 14 July 2013

                   
नासिरा शर्मा के उपन्यास और भारतीय मुसलमान

                             भारत में सन् सात सौ ग्यारह ईसवी (711 CE) में मुसलमानों का आगमन हुआ था। इसी साल वे स्पेन में भी दाखिल हुए थे। मुसलामानों का भारत में दाखिल होने का कारण था, समुद्री लूटेरों द्वारा मुसलमानों के नागरिक जहाज़ (पानी के जहाज़) को बंधक बनाना, जो कि सिंध के राजा दाहिर के राज्य में आता था। जब राजनैतिक और कुटनीतिक प्रयास विफ़ल हो गए तो हज्जाज बिन युसूफ ने जो कि बगदाद के थे, ने एक बेहद छोटी सेना के साथ मुहम्मद बिन क़ासिम को भेजा जो उस वक़्त मात्र सत्रह (17) वर्ष के थे मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध के राजा दाहिर को हरा कर जीत हासिल की, वहां जहां वर्तमान पाकिस्तान का हैदराबाद है। राजा दाहिर ने अपने पुत्रों और भारत के दूसरे राजाओं से मदद मांगी और मुहम्मद बिन क़ासिम से लडाई की। जिसके फ़लस्वरूप मुहम्मद बिन क़ासिम ने निरून, रावर, बहरोर, ब्रह्मनाबाद, अरोर, दीपालपुर और मुल्तान पर सात सौ तेरह (713 CE) में जीत हासिल की और सिंध और पंजाब के राज्यों से लेकर कश्मीर तक अपना राज्य स्थापित किया। मुहम्मद बिन क़ासिम की उम्र उस वक़्त मात्र उन्नीस (19) साल थी। तब से (713 CE) आगे सदियां गुजरते हुए 1857 तक (मुग़ल साम्राज्य के पतन तक ) भारत पर आधिपत्य था।  मुहम्मद बिन क़ासिम का भारत की जनता के साथ व्यवहार बेहद न्यायिक था, यही वजह थी कि जब वह बग़दाद वापस लौट रहा था तो यहां की जनता ने उसको नम आंखों से विदाई दी थी। भारत की जनता निराश थी क्योंकि उन्हें मुहम्मद बिन क़ासिम से बहुत प्यार मिला था।

           मालबार में ही एक कम्युनिटी ऐसी भी थी जो वहां चक्रवर्ती सम्राट फ़र्मस के हज़रत मुहम्मद (ईश्वर की उन पर शांति हो) के हाथों इस्लाम कुबुल करने के बाद से रह रही थी। सन् 713 CE से भारत में मुस्लिम साम्राज्य का आगाज़ हो चुका था जो की सन् 1857 तक जारी रहा, यह सफ़र कुछ ऐसे रहा कि कई और मुस्लिम शासक आये जो कि अपने ही मुस्लिम भाईयों से लड़े और अपना साम्राज्य फैलाया फिर चाहे वो मध्य एशिया के तुर्क हों, अफ़गान हों,  मंगोल की संताने हों या मुग़ल।

             ग्यारहवीं शताब्दी में मुस्लिम शासकों ने दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया जो कि बाद में मुग़ल शासकों की भी देश की राजधानी रही और सन् 1857 तक रही जब बहादुर शाह ज़फर को अंग्रेजों ने पदच्युत कर दिया। दिल्ली आज भी हमारे वर्तमान भारत देश की राजधानी है। दो सदी पहले भारत के सम्राट अकबर के द्वारा कुछ अंग्रेजों को यहां रुकने की इजाज़त दी गयी थी। इसके दो दशक बाद ही अंग्रेजों ने भारत के छोटे-छोटे राजाओं और नवाबों से सांठ-गांठ कर ली और मुग़ल शासकों के खिलाफ़ राजाओं और नवाबों की सेना की ताक़त बढ़ाने की नियत से उन पर खर्च करना शुरू कर दिया और मुग़ल शासक अंग्रेज़ों से दो सदी तक लड़ते रहे और आखिरी में सन् 1857 में अंग्रेज़ों ने मुग़ल साम्राज्य का अंत कर दिया।

                  भारत पर हज़ारों साल तक शासन करने के बावजूद भारत में मुस्लिम अल्प-संख्यक थे और आज भी अल्प-संख्यक ही हैं, बावजूद इसके भारत में ही दुनिया में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा मुसलमान रहते हैं। मुसलमानों के भारत पर इतने लम्बे समय तक राज करने का राज़ कुछ ऐसा ही था कि उनका अख़लाक़ और अंदाज़ यहां की जनता से बेहद मुहब्बत भरा था और यहां की जनता (बहु-संख्यक) ने भी उनको स्वीकारा और साथ-साथ रहे। वो लोग जो ये कहते हैं कि इस्लाम तलवार के बल पर फैला है के मुहं पर भारत के बहु-संख्यक लोग तमाचा समान है और वे यह गवाही दे रहे हैं कि अगर वाकई इस्लाम तलवार की ज़ोर पर फैला होता तो क्या वाक़ई भारत में हजारों साल तक एकछत्र राज करने पर भी इतने हिंदू बचे होते अर्थात नहीं। भारत में अस्सी प्रतिशत (80%) हिंदू की मौजूदगी इस बात की शहादत दे रही है कि मुस्लिम शासकों ने तलवार नहीं मुहब्बत सिखाई। मुसलमानों का यह फ़न आज भी उनको दूसरो से अलग करता है।

         भारत में मुस्लिम शासकों की पहचान यहां के इतिहास पढ़ने पर मालूम हो जाती है कि वे कितने पुर-खुलूस, मुहब्बती और प्रजा-प्रेमी थे और उन्होंने न्याय, सांस्कृतिक और सामजिक समरसता, बोलने की आज़ादी, धार्मिक आज़ादी, दूसरे धर्मों एवं लोगों के प्रति प्रेम-भाव, सभी धर्मों की भावनाओं के मद्देनज़र कानून-व्यवस्था की स्थापना, लोक-निर्माण कार्य, शैक्षणिक कार्य की स्थापना की।

          उस वक़्त जब यहां मुस्लिम शासकों का राज था भारत में मुसलमानों की आबादी बीस प्रतिशत (20%) थी, आज (15%) है। अगर पकिस्तान और बांग्लादेश अलग न होते तो हो सकता है कि भारत दुनिया का अकेला और पहला ऐसा देश होता जहां मुसलमानों की जनसंख्या सबसे ज्यादा होती। मगर अफ़सोस कि आज़ादी से पहले की छोटी सी भूल के कारण भारत देश के टुकड़े-टुकड़े हो गए। "लम्हों ने की खता और सदियां भुगत रही है..."

         जब अंग्रेजों ने यह फैसला कर लिया कि भारत को आज़ादी दे देनी चाहिए और भविष्य के शासकों (पूर्व के शासकों अर्थात मुसलामानों) को उनको सौप देना चाहिए। भारत के आज़ादी के ऐन मौक़े पर भारत का विभाजन करा दिया गया। जिसके फलस्वरूप पाकिस्तान बन गया।
                 मुसलमानों के पिछड़ेपन के कारणों की तलाश से पहले इस सच्चाई से रू-ब-रू होना अति आवश्यक है कि भारतीय मुसलमान न सिर्फ पिछड़ेपन की बोझ तले दबा हुआ है बल्कि 1947 में देश के बंटवारे ने मुसलमानों को अपने ही देश में मुजरिम बना दिया, क्योंकि बंटवारे की पूरी ज़िम्मेदारी मुसलमानों के सर पर बांधी गई। इसके साथ ही बंटवारे ने पुराने ज़ख्मों को उधेड़ा है और इसके फलस्वरूप मुसलमानों को बंटवारे के गुनाह की सज़ा के साथ-साथ आठवीं सदी में सिंध पर हमला करने वाले मुहम्मद क़ासिम और इनके साथ अफग़ान, तुर्क, मुग़ल एवं दूसरे मुसलमान बादशाहों ने अपनी हिंदू जनता के साथ जो अत्याचार किए थे उसकी भी क़ीमत चुकानी पड़ी और असका पदार्पण हिंदू-मुस्लिम दंगों के समय साफ़ झलकता है।
          नासिरा शर्मा का लेखन अक्सर विवादों में रहा है। चाहे वह ईरान की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उनका लेख हो या पाकिस्तान और अफगानिस्तान में स्त्रियों की अपमानित और नारकीय जिंदगी का बेखौफ वर्णन। उन्होंने अलग-अलग मुस्लिम देशों की सामाजिक स्थितियों का वर्णन करते वक्त उनकी आपस में तुलना भी की है कि कैसे इराक की महिलाएं पाकिस्तान व तुर्की की महिलाओं की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता से जीती हैं। नासिरा शर्मा ने महिला कथाकार होते हुए ईरान की क्रांति के दौरान वहां जाकर साहस और जिजीविषा के साथ कार्य किया और "सात नदियां एक समंदर" तथा "जहां फव्वारे लहू रोते हैं" जैसी कृतियां गढ़ीं। ‘सात नदियाँ एक समंदर’, ‘शाल्मली’, ‘ठीकरे की मंगनी’, ‘ज़िंदा मुहावरे’, ‘अक्षयवट’, ‘कुइयाँजान’, ‘जीरो रोड’  इनके चर्चित उपन्यास हैं।
          नासिरा शर्मा का साहित्य उपन्यास और कहानी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने हमारे समय के उन ज्वलंत मुद्दों पर चिंतन किया है जिससे हमारी सामाजिक संरचना, हमारी लोकतांत्रित सत्ता और हमारी संस्कृति प्रभावित रही है। ‘शाल्मली’ उपन्यास में नासिरा शर्मा शाल्मली की सास के बहाने उस मुद्दे से भिड़ती हैं जो कि अक्सर नारी संबंधी चर्चाओं में उठता है कि नारी ही नारी की दुश्मन होती है। नासिरा शर्मा के समग्र लेखन में से उभरता यह एक सकारात्मक नज़रिया उनके लेखन की विशेषता है। नासिरा शर्मा ने इराक़, अफ़ग़ानिस्तान तथा ईरान पर भी जो अध्ययन ग्रंथ लिखे हैं, वे उनके उस मिजाज़ और चिंताओं को प्रकट करते हैं जो हमारे समय के अंतरराष्ट्रीय बोध का एक अहम् अंश है। असल में नासिरा शर्मा हमारे समय के दर्दनाक़ मुद्दों की जड़ों और उनमें समाप्त होते मानव-अधिकारों का अपनी रचनाओं के द्वारा अत्यन्त मार्मिक चित्रण करती हैं। औरत के लिए औरत पुस्तक एक तरह से ‘शाल्मली’ तथा ‘ठीकरे की मंगनी’ के सह पाठ के रूप में पढ़ी जा सकती है, उसी तरह ‘ज़िन्दा मुहावरे’ और ‘अक्षयवट’ ये दोनों पुस्तके मुसलमान और राष्ट्र का सहपाठ बनती हैं। ‘पत्थर गली’ आदि कहानी संग्रह  मानव अधिकारों के प्रश्नों को सीधे-सीधे साहित्य में उठाने के लिए नासिरा शर्मा की भूमिका अग्रणीय मानी जा सकती है। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय दृष्टि-पटल पर इनकी रचनाओं में मानव अधिकारों का मुद्दा सिर चढ़ कर बोलता है। नासिरा शर्मा अपने साहित्य में इस तरह के मुद्दों को पूरी गंभीरता से उठाना उनके निजी लेखकीय दृष्टिकोण का चित्रण करता है। वे एक तरह से प्रतिबद्धता के साथ लिखती हैं। एक लेखक अपने आस-पास के समाज में फैली इन समस्याओं तथा मर्यादाओं के सिवा अपने लेखन के जरिए लेखक जो कुछ भी अपने समाज से ग्रहण करता है और यदि उसे कुछ लौटना है तो एक बेहतर स्वरूप में अपने समाज को ही।

मनुष्य की निजता, सोशल साइट्स और अमेरिका
                                    यदुवंश यादव  
                    
                      यह बहुत ही सामान्य बात है कि किसी की भी निजता में दखल देना नितांत ही गलत है। वह भी तब, जब इस निजता से किसी व्यक्ति, समुदाय, संस्था, राष्ट्र पर कोई गलत प्रभाव न पड़ रहा हो। अभी बीते दिनों की ही बात है कि अमेरिकी सरकार द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन प्रिज्म के बारे में पता चला। इस ऑपरेशन के तहत अमेरिकी सरकार सोशल साइट्स व इंटरनेट नेटवर्किंग के माध्यम से पूरे विश्व के लोगों की वैचारिक व व्यवहारिक निजता को खंगाल कर आंकड़े एकत्रित करने में लगी है। आज पूरे विश्व में सोशल साइटों का क्रेज़ बहुत बढ़ गया है। लोग अपनी अधिकांश वैचारिक या व्यवहारिक प्रवृत्तियों को गाहे-बगाहे इन पर प्रदर्शित कर रहें हैं। किसी भी सरकार या सत्ता का समर्थन हो या विरोध, किसी भी उत्पाद की पसंद से नापसंद तक, आस्था-अनास्था, शिक्षा, रोजगार, पूंजी आदि सभी प्रश्न इन सोशल साइट्स पर लोगों के द्वारा व्यक्त किए जाते हैं। ये सारी वैचारिकी उनकी अपनी निजी वैचारिकी होती है। इन वैचारिकी से समाज व सत्ताएं भी प्रभावित होती रहती हैं। अमेरिका विश्व सत्ता व विश्व शक्ति की लोलुपता के कारण ही इन आंकड़ों को इकट्ठा करने में लगा है। आप क्या सोच रहे हैं या आप क्या कर रहे हैं इन सब चीजों का आंकड़ा वह इस ऑपरेशन के तहत एकत्रित कर रहा है। अधिकांश सत्ताएं अमेरिकी सत्ता की पिछलग्गू बनी हुई हैं, इसी बात का फायदा उठाकर अमेरिकी सत्ता पूरे विश्व को प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष रूप से ही अपने अधीन करने पर तुली है। कौन सा देश या समाज उसकी प्रवृत्तियों के विरोध में है वह इसका आकलन भी इसी के द्वारा करेगा। लोगों में किस तरह के उत्पाद की आवश्यकता है, शिक्षा किस तरह की होनी चाहिए आदि इसी तरह के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपना आधिपत्य जमाकर उसे अपनी साम्राज्यवादी सोच के अनुसार चलाने के प्रयास में है। यदि कोई भी देश तकनीकी रूप से समृद्ध है तो यह कत्तई नहीं होना चाहिए कि वह अन्य लोगों की निजता में दखलंदाजी करे। आज तकनीकी इतनी समृद्ध है कि वह इसी देश के किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत परिचय से लेकर उसके बैंकिंग व ई-मेल तथा अन्य नेटवर्किंग के बारे में आसानी से पता लगा सकती है। निजता प्राकृतिक रूप से व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इसमें सामान्य दखल भी गलत होता है, और इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि अमेरिका जैसा देश या फिर विश्व का कोई भी देश इसका सार्थक उपयोग ही करेगा।

          आज जो फेसबुक अधिकांश व्यक्तियों के जीवन का अभिन्न अंग बना है और निजता के स्तर पर भी वह एक प्रभावी तंत्र है जिस कारण से ही अमेरिकी सत्ता ने इसके मुखिया जुकरबर्ग से इसी परिप्रेक्ष्य में एक अनुबंध भी किया है। इस अनुबंध के तहत फेसबुक संस्था उन सभी लोगों की व्यक्तिगत जानकारी व इस पर किए गए प्रत्येक कार्य-व्यापार की जानकारी अमेरिका को देगा जो लोग इस सोशल नेटवर्किंग साइट से जुड़े हैं। निजता पर दखल का यह एक बड़ा उदाहरण है और इसका विरोध भी होना चाहिए। व्यक्ति की निजता ही उसको समाज के सामने एक विशेष रूप में प्रस्तुत करती है। व्यक्ति की निजता भी समाज के बनने में कहीं न कहीं उत्तरदाई है, इसलिए सुरक्षा के नाम पर झूठे तर्क  देना बेमानी सी बात लगती है। 

Friday, 12 July 2013

दख़ल की दुनिया: गंटी प्रसादम जिंदा रहेंगे

दख़ल की दुनिया: गंटी प्रसादम जिंदा रहेंगे: रेयाज उल हक वे जिंदा रहेंगे. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कल दोपहर में उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि हत्य...