जैसे आप कुदरत के पालने में झूल रहे हों!
आज इरफान नहीं हैं, हिंदी सिनेमा का एक संजीदा कलाकार चला गया। मुझे व्यक्तिगत रूप में बहुत पसंद थे इरफान। फिल्मों में आने के लिए एक लंबा संघर्ष किया। अपने अंतिम दिनों में स्वास्थ्य को लेकर भी खूब संघर्ष किया। उन्होंने अपने लोगों और दर्शकों को लेकर इधर बीच कई खत भी लिखा। उसमें से एक खत जो बहुत पढ़ा गया वह यहाँ लगा रहा हूँ, जिसको लंदन में इलाज के समय लिखा था।
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कुछ महीने
पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएन्डोक्राइन कैंसर से ग्रस्त हूं। मैंने
पहली बार यह शब्द सुना था। खोजने पर पाया कि मेरे इस बीमारी पर बहुत ज्यादा शोध
नहीं हुए हैं, क्योंकि
यह एक दुर्लभ शारीरिक अवस्था का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता
ज्यादा है। अभी तक अपने सफर में मैं तेज-मंद गति से चलता चला जा रहा था। मेरे साथ
मेरी योजनाएं, आकांक्षाएं, सपने और
मंजिलें थीं।
मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया, ‘आपका स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं।’ मेरी समझ में नहीं आया, ‘ना ना मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है। जवाब मिला, ‘अगले किसी भी स्टॉप पर आपको उतरना होगा, आपका गंतव्य आ गया।अचानक एहसास होता है कि आप किसी ढक्कन (कॉर्क) की तरह अनजान सागर में, अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं... लहरों को काबू कर लेने की गलतफहमी लिए।
कुछ हफ्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया। बेइंतहा दर्द हो रहा है। यह तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द... अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है। कुछ भी काम नहीं कर रहा है। ना कोई सांत्वना, ना कोई दिलासा। पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आई थी। दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ।
मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूं, उसमें बालकनी भी है। बाहर का नज़ारा दिखता है। कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है। सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है... वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है। मेरे बचपन के ख्वाबों का मक्का, उसे देखने पर पहली नज़र में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ। मानो वह दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं।
मैं दर्द की गिरफ्त में हूं- और फिर एक दिन यह अहसास हुआ... जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूं, जो निश्चित होने का दावा करे। ना अस्पताल और ना स्टेडियम। मेरे अंदर जो शेष था, वह वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था। मेरे अस्पताल का वहां होना था। मन ने कहा- केवल अनिश्चितता ही निश्चित है।
इस अहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया। अब चाहे जो भी नतीजा हो, यह चाहे जहां ले जाए, आज से आठ महीनों के बाद, या आज से चार महीनों के बाद या फिर दो साल। चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया।
पहली बार मुझे शब्द ‘आज़ादी‘ का एहसास हुआ, सही अर्थ में! एक उपलब्धि का अहसास। इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया. उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरी एक एक कोशिका में पैठ गया। वक्त ही बताएगा कि वह ठहरता है या नहीं। फिलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं।
इस सफर में सारी दुनिया के लोग... सभी मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम जोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं. मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गई हैं, एक बड़ी शक्ति, तीव्र जीवन धारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही है।
अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है। मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं। लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नई दुनिया दिखाती हैं. अहसास होता है कि जरूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो। जैसे आप कुदरत के पालने में झूल रहे हों!
मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया, ‘आपका स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं।’ मेरी समझ में नहीं आया, ‘ना ना मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है। जवाब मिला, ‘अगले किसी भी स्टॉप पर आपको उतरना होगा, आपका गंतव्य आ गया।अचानक एहसास होता है कि आप किसी ढक्कन (कॉर्क) की तरह अनजान सागर में, अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं... लहरों को काबू कर लेने की गलतफहमी लिए।
कुछ हफ्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया। बेइंतहा दर्द हो रहा है। यह तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द... अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है। कुछ भी काम नहीं कर रहा है। ना कोई सांत्वना, ना कोई दिलासा। पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आई थी। दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ।
मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूं, उसमें बालकनी भी है। बाहर का नज़ारा दिखता है। कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है। सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है... वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है। मेरे बचपन के ख्वाबों का मक्का, उसे देखने पर पहली नज़र में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ। मानो वह दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं।
मैं दर्द की गिरफ्त में हूं- और फिर एक दिन यह अहसास हुआ... जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूं, जो निश्चित होने का दावा करे। ना अस्पताल और ना स्टेडियम। मेरे अंदर जो शेष था, वह वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था। मेरे अस्पताल का वहां होना था। मन ने कहा- केवल अनिश्चितता ही निश्चित है।
इस अहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया। अब चाहे जो भी नतीजा हो, यह चाहे जहां ले जाए, आज से आठ महीनों के बाद, या आज से चार महीनों के बाद या फिर दो साल। चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया।
पहली बार मुझे शब्द ‘आज़ादी‘ का एहसास हुआ, सही अर्थ में! एक उपलब्धि का अहसास। इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया. उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरी एक एक कोशिका में पैठ गया। वक्त ही बताएगा कि वह ठहरता है या नहीं। फिलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं।
इस सफर में सारी दुनिया के लोग... सभी मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम जोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं. मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गई हैं, एक बड़ी शक्ति, तीव्र जीवन धारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही है।
अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है। मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं। लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नई दुनिया दिखाती हैं. अहसास होता है कि जरूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो। जैसे आप कुदरत के पालने में झूल रहे हों!
