Sunday, 14 July 2013

मनुष्य की निजता, सोशल साइट्स और अमेरिका
                                    यदुवंश यादव  
                    
                      यह बहुत ही सामान्य बात है कि किसी की भी निजता में दखल देना नितांत ही गलत है। वह भी तब, जब इस निजता से किसी व्यक्ति, समुदाय, संस्था, राष्ट्र पर कोई गलत प्रभाव न पड़ रहा हो। अभी बीते दिनों की ही बात है कि अमेरिकी सरकार द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन प्रिज्म के बारे में पता चला। इस ऑपरेशन के तहत अमेरिकी सरकार सोशल साइट्स व इंटरनेट नेटवर्किंग के माध्यम से पूरे विश्व के लोगों की वैचारिक व व्यवहारिक निजता को खंगाल कर आंकड़े एकत्रित करने में लगी है। आज पूरे विश्व में सोशल साइटों का क्रेज़ बहुत बढ़ गया है। लोग अपनी अधिकांश वैचारिक या व्यवहारिक प्रवृत्तियों को गाहे-बगाहे इन पर प्रदर्शित कर रहें हैं। किसी भी सरकार या सत्ता का समर्थन हो या विरोध, किसी भी उत्पाद की पसंद से नापसंद तक, आस्था-अनास्था, शिक्षा, रोजगार, पूंजी आदि सभी प्रश्न इन सोशल साइट्स पर लोगों के द्वारा व्यक्त किए जाते हैं। ये सारी वैचारिकी उनकी अपनी निजी वैचारिकी होती है। इन वैचारिकी से समाज व सत्ताएं भी प्रभावित होती रहती हैं। अमेरिका विश्व सत्ता व विश्व शक्ति की लोलुपता के कारण ही इन आंकड़ों को इकट्ठा करने में लगा है। आप क्या सोच रहे हैं या आप क्या कर रहे हैं इन सब चीजों का आंकड़ा वह इस ऑपरेशन के तहत एकत्रित कर रहा है। अधिकांश सत्ताएं अमेरिकी सत्ता की पिछलग्गू बनी हुई हैं, इसी बात का फायदा उठाकर अमेरिकी सत्ता पूरे विश्व को प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष रूप से ही अपने अधीन करने पर तुली है। कौन सा देश या समाज उसकी प्रवृत्तियों के विरोध में है वह इसका आकलन भी इसी के द्वारा करेगा। लोगों में किस तरह के उत्पाद की आवश्यकता है, शिक्षा किस तरह की होनी चाहिए आदि इसी तरह के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपना आधिपत्य जमाकर उसे अपनी साम्राज्यवादी सोच के अनुसार चलाने के प्रयास में है। यदि कोई भी देश तकनीकी रूप से समृद्ध है तो यह कत्तई नहीं होना चाहिए कि वह अन्य लोगों की निजता में दखलंदाजी करे। आज तकनीकी इतनी समृद्ध है कि वह इसी देश के किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत परिचय से लेकर उसके बैंकिंग व ई-मेल तथा अन्य नेटवर्किंग के बारे में आसानी से पता लगा सकती है। निजता प्राकृतिक रूप से व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इसमें सामान्य दखल भी गलत होता है, और इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि अमेरिका जैसा देश या फिर विश्व का कोई भी देश इसका सार्थक उपयोग ही करेगा।

          आज जो फेसबुक अधिकांश व्यक्तियों के जीवन का अभिन्न अंग बना है और निजता के स्तर पर भी वह एक प्रभावी तंत्र है जिस कारण से ही अमेरिकी सत्ता ने इसके मुखिया जुकरबर्ग से इसी परिप्रेक्ष्य में एक अनुबंध भी किया है। इस अनुबंध के तहत फेसबुक संस्था उन सभी लोगों की व्यक्तिगत जानकारी व इस पर किए गए प्रत्येक कार्य-व्यापार की जानकारी अमेरिका को देगा जो लोग इस सोशल नेटवर्किंग साइट से जुड़े हैं। निजता पर दखल का यह एक बड़ा उदाहरण है और इसका विरोध भी होना चाहिए। व्यक्ति की निजता ही उसको समाज के सामने एक विशेष रूप में प्रस्तुत करती है। व्यक्ति की निजता भी समाज के बनने में कहीं न कहीं उत्तरदाई है, इसलिए सुरक्षा के नाम पर झूठे तर्क  देना बेमानी सी बात लगती है। 

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