ज़माना
साहित्य व समाज का...
Monday, 28 October 2013
दख़ल की दुनिया: रात का शहर उनके लिए भय का शहर है
दख़ल की दुनिया: रात का शहर उनके लिए भय का शहर है
: कीर्ति सुन्द्रियाल संवैधानिक आज़ादी सांस्कृतिक आयामों को बदल नहीं पा रही, बल्कि संस्कृति की पुरानी गुलामी समाज की नब्ज में बहती ही रहती...
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