समाज मै अलग होना चाहता हूँ इस समाज से ,इसकी परिभाषा से ,इसकी पाबंदियो से,इसकी विकलांगता से,जो खाए जा रहा है मुझे दिन-प्रतिदिन अपने प्रतिमानों से,अपने आयामों से,अपने नियमो से,मै बध सा गया हूँ उड़ना चाहता हूँ पर नहीं उड़ने देता समाज सदियों से चली आ रही सभ्यता, संस्कृति के नाम पर क्योंकि उनको उस पर गर्व है
No comments:
Post a Comment